Monday, September 2, 2019

समर्पण २, सरलिकृत पार्वणश्राद्धविधि

नेपालीमा सरलिकृत पार्वणश्राद्धविधि
रल तर्पणविधि
गौदान संकल्प
१.साइलि औंलामका कुशको औंठी लगाएर, एउटा दुनामा गाईको मूल्य अर्पण गरेर रुपैयाँ पैसा राख्ने त्यसमा जल राख्ने अनि एउटा कुशको पवित्र, पूmल, जौ, तिल राखेर नं १ मा दिएको मन्त्रले पवित्रद्वारा भूईंमा तर्पण गर्दै जाने ।( गौदान लगायत सप्त मनुष्यलाई समेत तर्पण दिदा सम्म औठि साइली औलामा र त्यसपछि पितृहरुलाई दिन शुरु गरेपछि अन्तसम्म नै चोरी औंलामा लगाउनु पर्ने हुन्छ) ।
तर्पण मन्त्रः ॐ मनो मे तर्पयत् वाचं मे तर्पयत् प्राणं मे तर्पयत्  चक्षुर्मे तर्पयत् श्रोत्रंं मे तर्पयतात्मानांं में तर्पयत् प्रजां में तर्पयत् पशून्में तर्पयत् गणान् में तर्पयत् गणा में मा पितृषन् ।
२. कर्ताले कुशपानी लिएर गाई राखेको दुनोलाई छोइ राख्ने, ब्राम्हणले तलको गोदान संकल्प पढ्नेः-
 संकल्प पढ्ने :-हरि ॐ तत्सत् ३ ॐ विष्णु ३ अद्यः श्रीमद्भगवतो महाँपुराणपुरुषस्य विष्णोराज्ञया प्रवर्तमानस्यसकल जगतश्रृष्टिकारिणो ब्राम्हणो व्दितीये परार्धे श्री श्वेतबराह कल्पे, वैवस्वतमन्वन्तरे अष्टाविंशतितमे सत्यत्रेताव्दापरान्ते, कलियुगे तस्य प्रथमचरणे जम्बूव्दीपे हिमवत् पर्वतैक नेपाल देशे, गङ्गादेव्याः उत्तरकोणे, पाशुपत क्षेत्रे तद्अन्तर्गत वाग्मती ....... दिग्भागे अमुक ग्रामे÷नगरे यहः पुण्यभुमौ  षष्टिसम्वत्सराणाम्मध्ये ..... नाम सम्बत्सरे, श्रीसूर्य दक्षिणायणे÷ शरद ऋतौ सौरेण÷चान्द्रेण मासोत्तमे आश्विन मासे चान्द्रेण आश्विन कृष्णपक्षे कृष्णे ...... तिथौ कन्या.राशि स्थिते श्रीसूर्ये ........राशि स्थितौ देवगुरौ .........राशि स्थिते चान्द्रमसि शेषेशु ग्रहेशु यथा यथा स्थान स्थितेषु सत्सु एवं ग्रह गण विशेषण विशिष्टायाम् अद्येः अमुक गोत्रः अमुक प्रवरः मध्यन्दिनीय शाखान्तर्गत शुक्लययुर्वेदाध्यायी अमुक शर्माऽहं     (वर्माहं, गुप्तोऽहम्)मम कायिकवाचिकमानसिक सांसर्गिकज्ञाताज्ञात सकलपापक्षयपूर्वकं श्री परमेश्वरप्रीत्यर्थ अमुक सगोत्राणां अस्मत्पितृपितामहप्रपिताणां अमुकामुक शर्मणानां सपत्निकानां वसुरूद्रआदित्य स्वरूपाणां तथा अमुक सगोत्राणां  अस्मन्मातामहप्रमातामहबृाद्धप्रमातानां अमुक अमुक शर्मणानां सपत्नीकानां  वसुरूद्रआदित्य स्वरूपाणां अद्यकर्तब्य महालय परपक्षान्तर्गत पार्वण श्राद्ध कर्तृत्वाधिकारसिद्धये अद्यदिनात् प्राक्कर्तव्यनियमकारण भक्ष्याभक्षस्पृस्यास्पृस्य चोष्याचोष्यादि सकल प्रत्यवाय परिहारार्थ इमां सर्वप्रायश्चित्त प्राजापत्यानुकल्पीभूतां गां रूद्रदैवतां तत्प्रत्याम्नायीभूतं व्यवाहारोकल्पितं द्रब्यं  (विष्णुदैवतां) अमुक गोत्राय अमुक शर्मणे ब्राम्हणाय प्रायश्चित्त गोदानत्वेन तुभ्यमहं संप्रददे ।
पूmल लिइ हात जोडेर गाईको प्रार्थाना- कपिले सर्वदेवानाम् पूजनियसि रोहिणी ।
 तिर्थदेव मयी यस्मात् अथः शान्तिम् प्रयच्छमे ।। गावोमें अग्रतः सन्तु गावो मैं सन्तु पृष्ठतः। गावो में हृदये सन्तु गवां मध्ये वसाम्यहम् ।।
 नं. ३ को मन्त्र पढेर दान प्रतिष्ठाको रुपैयाँलाई पूजागर्ने  र रुपैयाँ हातमा लिई  दानप्रतिष्ठाको संकल्पमन्त्र पढेर ब्राम्हणको हातमा राखिदिनेः
ततो दानप्रतिष्ठा
ॐ अद्य कृतैतत् सर्वप्रायश्चित्त निमित्तक गोदान कर्मणः (गोप्रत्याम्नायी भूत द्रव्यदान कर्मणो) प्रतिष्ठा साङ्गतासिद्धर्थ इमांं दानप्रतिष्ठाद्रवं रौप्यखण्डं चन्द्र दैवतं अमुक गोत्राय अमुक शर्मणे सुपुजिताय ब्राम्हणाय दानप्रतिष्ठात्वेन तुभ्यमहं संप्रददे ।
ब्राम्हणले यो स्वस्ति मन्त्र पढि कर्तालाई अभिशेष गरिदिने ः                                             कोदात्कस्माऽदात् कोमादात्कस्मा ऽअदात्कामो दात्कामायादात्कामोदाता कामैतत्ते .
तर्पणविधि
तर्पण संकल्पस् :- कुश, तील जल लिएर तलको संकल्प पाठ गर्ने
  हरि ॐ तत्सत् ३ ॐ विष्णु ३ अद्यःपूर्वसंकल्पमुच्चार्य अमुक गोत्र अमुक त्रिप्रवर मध्यन्दिनीय शाखान्तर्गत शुक्लययुर्वेदाध्यायी ......... शर्माहं अमुक सगोत्राणां अस्मत्पितृपितामहप्रपिताणां अमुक गोत्राणां सपत्निकानां वसुरूद्रआदित्य स्वरूपाणां तथा अमुक सगोत्राणां  अस्मन्मातामहप्रमातामहबृद्धप्रमातानां अमुक अमुक शर्मणानां सपत्नीकानां  वसुरूद्रआदित्य स्वरूपाणां अद्यकर्तब्य महालय परपक्षान्तर्गत पार्वण श्राद्धाङ्गत्वेन श्रीमत्परमेश्वरप्रीतये देवर्षिणां, मनुष्याणां दिव्यपितृणां, स्वपितृणां च तर्पणमहं करिष्ये ।
देवर्षि तर्पणः
. पूर्वतर्फ फर्केर अर्घपात्र वा नभए दुनामा पवित्रको टुप्पो माझि र चोरी औंलातर्फ फर्काएर जौ, कुश, चन्दन, अक्षता, पूmलपाती लिएर तलको मन्त्र पढ्दै देवर्षिहरुलाई आव्हान गर्ने र देवतीर्थबाट विश्वेदेवहरुलाई एक एक अंजली तर्पण दिने :-
 मन्त्रः- ॐ विश्वेदेवासऽआगत श्रृणुतामऽइम (ǵदीर्घ गुं)  हवम् । एदं बर्हि्र्निषीदत ।। ॐ विश्वेदेवाः श्रृणुतेम ǵ हवम्मे येऽअन्तरिक्षे यऽउपद्यविष्ठ ।। येऽअग्निजिह्वाऽउतवा यजत्राऽआसद्यास्मिन् बर्हि्षि मादयध्वम् ।। ॐ भुर्भुवः स्वः ब्रम्हादयो देवा इहआगच्छन्तु इह तिष्ठन्तु गृहण्न्त्वेतान्जलान्जलीन् ।
ॐ ब्रम्हा तृप्यताम्, ॐविष्णु तृप्यताम्, ॐ रुद्रस्तृप्यताम्, ॐ प्रजापतिस्तृप्यताम् ॐ देवास्तृप्यताम्, ॐ छन्दांसिस्तृप्यताम्, ॐ वेदास्तृप्यताम्, ॐ ऋषयस्तृप्यताम्, ॐ  पुणाचार्यस्तृप्यताम्, ॐ  गन्दर्वास्तृप्यताम्, ॐ इतराचार्यास्तृप्यताम्, ॐ सम्वत्सरसावयवतृप्यताम्, ॐ देव्यतृप्यताम्, ॐ अप्सरसस्तृप्यताम्, ॐ देवानुगास्तृप्यताम्, ॐ नागास्तृप्यताम्, ॐ स्तृप्यताम्, ॐ सागरातृप्यताम्, ॐ पर्वतातृप्यताम्, ॐ सरिततृप्यताम्, ॐमनुष्यास्तृप्यताम्, ॐ यक्षातृप्यताम्, ॐ राक्षांसितृप्यताम्, ॐ पिशाचास्तृप्यताम्, ॐ सुपर्णास्तृप्यताम्, ॐ भूतानितृप्यताम्, ॐ पशवतृप्यताम्, ॐ वनस्पतयस्तृप्यताम्, ॐ ओषधयस्तृप्यताम्, ॐ भूतग्रामचतुर्विधस्तृप्यताम् ॐ मरीचिस्तृप्यताम्, ॐ अत्रिस्तृप्यताम्, ॐ अंगिरास्तृप्यताम्, ॐ पुलस्त्यस्तृप्यताम्, ॐपुलमस्तृप्यताम्, ॐ क्रतुस्तृप्यताम्, ॐप्रचेतास्तृप्यताम्म्, ॐ वसिष्ठस्तृप्यताम्, ॐ भृगुस्तृप्यताम्, ॐ नारदस्तृप्यताम्,
मनुष्य तर्पणः 
५. जनैको माला लगाउने र तलको मन्त्र पढ्दै आव्हान गर्ने र उत्तरतर्फ फर्किने र पवित्रको टुप्पो कान्छी औंलाको फेदतर्फबाट (कायतीर्थ) पानी पर्ने गरी राख्ने  नं. ५ को मन्त्र पढ्दै कुशपानीले २।२ अंजली दिने
मन्त्रः- ॐ भूर्भुवः स्वःसनकादयः सप्तमनुष्या इहागच्छन्त्वि इह तिष्ठन्तु गृहण्न्त्वेताञ्जलाञ्जलीन् ।  ॐ सनकस्तृप्यताम्, ॐ सनन्दनस्तृप्यताम्,  ॐ सनातनस्तृप्यन्ताम्, ॐ कपिलस्तृप्यताम्,  ॐ आसुरिस्तृप्यताम्, ॐ वोढुस्तृप्यताम्,   ॐ पञ्चशिखस्तृप्यम्
दिब्यपितृ आव्हानः        
६.अपसव्य हुने, देब्रेघुँडा मार्ने, हातमा खगौतो राख्ने, खगौतोको टुप्पो बुढिऔलाको फेदतर्फ फर्काउने  (पितृतीर्थ)  पवित्रको टुप्पो आपूmतिर फर्काउने, खगौतोमा कुश, तिल, चन्दन, पूmल राख्ने र  तलको मन्त्र पढेर ३।३ अंजली दिने:-
 मन्त्रः- ॐ उसन्तस्त्वा निधिमह्युशन्तः समिधीमहि । उशन्तुशतऽआवह पितृन् हविषेऽवत्तवे ।। ॐ आयन्तु नः पितरः सोम्यासो अग्निष्वात्ताःपथिभिर्देवयानैः । अस्मिन् यज्ञेस्वधयामदन्तोधि बु्रवन्तु तेवन्त्वस्मान् ।।
७. दिब्यपितृतर्पणः                                                                                    
मन्त्रँ ॐ काव्यवाडनलादयो दिव्यपितर इहागच्छन्तिु इह तिष्ठन्तु गृहण्न्त्वेताञ्जलाञ्जलीन् ।                       ॐ काव्यवाडनलस्तृप्यतामिदं तिलोदकं तस्मै स्वधा नामः ३ । ॐ सोमस्तृप्यतामिदं तिलोदकं तस्मै स्वधा नमः ३ । ॐ यमस्तृप्यतामिदं तिलोदकं तस्मै स्वधा नमः ३ ।  ॐ अर्यमास्तृप्यतामिदं तिलोदकं तस्मै स्वधा नमः ३ । ॐ अग्निष्वात्तास्तृप्यतामिदं तिलोदकं तेभ्यः स्वधा नमः ३ ।   ॐ सोमपास्तृप्यतामिदं तिलोदकं तेभ्यः स्वधा नमः ३ ।  ॐ वर्हिषदस्तृप्यतामिदं तिलोदकं तेभ्य स्वधा नमः ३ । ॐ यमाय नमः ३ । ॐ धर्मराजायै  नमः ३ । ॐ मृतवे नमः ३ । ॐ अन्तकाय नमः ३ ।ॐ वैवस्वताय नमः ३ । ॐ कालाय नमः ३ । ॐ सर्वभूतक्षयाय नमः ३ । ॐ औदुम्बराय नमः ३ । ॐ दध्नाय नमः ३ । ॐनीलाय नमः ३ । ॐपरमेष्ठिने  नमः ३ । ॐवृकोधराय नमः ३ । ॐ चित्राय नमः ३ । ॐ नमः चित्रगुप्ताय नमः ३ ।                                                                                                                                                                    
८. स्वपितृ आव्हानाः- सोहि आसनमा रहेर तलको मन्त्र पढेर आफ्ना स्वपितृहरुलाई आव्हान गर्ने.-       मन्त्रः- ॐ आगच्छन्तु में पितर इमान् गृहण्न्त्वेताञ्जलाञ्जलीनिति पितृनावाह्य तर्पयत्                                 ॐ उदीरतामवरऽउत्परासऽउन्मध्यमाः पितरः सोम्यासः ।असुं य ईयुरबृकाऽऋतज्ञास्ते नोवन्तु पितरो हवेषु ।।                    
स्वपितृ तर्पण
९. तलको मन्त्र पढ्दै आफ्ना पितालाई प्रथमाञ्जली दिने  :-                                                                      ॐ अद्येहा अमुक गोत्रोऽअस्मत्पिताऽअमुक शर्मा वसुस्वरुपस्तृप्यतामिदं तिलोदकं तस्मै स्वधा । इति प्रथमाञ्जली पित्रे दद्यात् ।
ॐ अंगिरसो नः पितरो नवग्वाऽअथर्वाणो भृगवः सोम्यासः । तेषांं वयʊसुमतौ  यज्ञियानामपिभद्रे सौमनसे स्याम ।                                                                                                                                                      
१० तलको मन्त्र पढ्दै आफ्ना पितालाई द्वितीयाञ्जली दिने :-                                                                  ॐ अद्येहा अमुक गोत्रोऽअस्मत्पिता ऽअमुक शर्मा वसुस्वरुपस्तृप्यतामिदं तिलोदकं तस्मै स्वधा । इति द्वितीयाञ्जली पित्रे दद्यात् ।
ॐ आयन्तु नः पितरः सोम्यासोग्निष्वात्ताः पथिभिर्देवयानैः । अस्मिन्यज्ञे स्वधया मदन्तोधिब्रुबन्तु तेवन्त्वस्मान्।                                                                                                                                              ११ तलको मन्त्र पढ्दै आफ्ना पितालाई तिृतीयाञ्जली दिने                                                                      ॐ अद्येहा अमुक गोत्रोऽअस्मत्पिता ऽअमुक शर्मा वसुस्वरुपस्तृप्यतामिदं तिलोदकं तस्मै स्वधा। इति तिृतीयाञ्जली पित्र दद्यात् ।                                                                                                                             ॐ उर्जं वहन्तीमृतं घृतम्पयः कीलालं परिस्रुतम् । स्वधास्थ तर्पयत् में पितृन् ।।
पितामह                                                                                                                                                  १२ तलको मन्त्र पढ्दै पितामहलई प्रथमाञ्जली  दिने .:-                                                                                   ॐ अद्येह अमुक गोत्रोऽ अस्मत्पितामह अमुक शर्मा रुद्रस्वरुपस्तृप्यतामिदं तिलोदकं तस्मै स्वधा । इति पितामहाय प्रथमाञ्जली  दद्यात् ।          
ॐ पितृभ्यः स्वधायिभ्यः स्वधा नामः पितामहेभ्यः स्वधायिभ्यः स्वधा नामः प्रपितामहेभ्यः स्वधायिभ्यः स्वधा नामः । अक्षन्न्पितरोमीदमन्त पितरोतीतृप्यन्त पितरः पितरःसुन्धध्वम् ।                                                                                                                    
१३ तलको मन्त्र पढ्दै पितामहलई द्वितीयाञ्जली दिने:-
ॐ अद्येह अमुक गोत्रोऽ अस्मत्पितामह अमुक शर्मा रुद्रस्वरुपस्तृप्यतामिदं तिलोदकं तस्मै स्वधा । इति पितामहाय द्वितीयाञ्जली दद्यात् ।                                                                                                               ॐ ये चेह पितरो ये च नेहयांश्च विद्ययाँ ऽउ च न प्रविद्य ।                                                                                  त्वं वेत्थयतितेजातवेदः स्वधाभियज्ञǵसुकृतञ्जुषस्व ।।      
१४ तलको मन्त्र पढ्दै पितामहलई तृतीयाञ्जली दिने:-
ॐ अद्येह अमुक गोत्रोऽ अस्मत्पितामह अमुक शर्मा रुद्रस्वरुपस्तृप्यतामिदं तिलोदकं तस्मै स्वधा । इति पितामहाय तृतीयाञ्जली दद्यात् ।                                                                                                              ॐमधुवाताऽऋतायते मधु क्षरन्ति सिन्धवः । माध्वीर्नः सन्तोषधीः ।।
 प्रपितामह                                                                                                                                                   १५ तलको मन्त्र पढ्दै प्रपितामहलाई प्रथमाञ्जली दिने _                                                                      ॐ अद्येह अमुक गोत्रोऽस्मत् प्रपितामहोऽ अमुक शर्मा आदित्यस्वरुपस्तृप्यतामिदं तिलोदकं तस्मै स्वधा । इति प्रपितामहाय प्रथमाञ्जली  दद्यात् ।                                                                                                        ॐ मधु नक्तमुतोषसो मधुमात्पार्थिवǵरजः । मधु द्यौरस्तुनः पिता ।।
१६ तलको मन्त्र पढ्दै प्रपितामहलाई द्वितीयाञ्जली दिने   :-                                                                     ॐ अद्येह अमुक गोत्रोऽस्मत् प्रपितामहऽ अमुक शर्मा आदित्यस्वरुपस्तृप्यतामिदं तिलोदकं तस्मै स्वधा । इति प्रपितामहाय द्वितीयाञ्जली  दद्यात् ।                                                                                                   ॐ मधुमान्नो बनस्पतिर्मधुमाऽअस्तु सूर्यः । माध्वीर्गावो भवन्तु नः ।।                                                          
१७ तलको  मन्त्र पढ्दै प्रपितामहलाई तृतीयाञ्जली दिने:-                                      
ॐ अद्येह अमुक गोत्रोऽस्मत् प्रपितामहऽ अमुक शर्मा आदित्यस्वरुपस्तृप्यतामिदं तिलोदकं तस्मै स्वधा । इति प्रपितामहाय तृद्वतीयाञ्जली  दद्यात् ।
ॐ आमा वाजस्य प्रसवो जगम्यादेमे द्यावापृथिवी विश्वरूपे ।                                                                            आमा गन्ता पितारामातरा चामा सोमोऽअमृतत्वेन गम्यात् ।।
आमालाई                                                                                                                                                     १८ तलको मन्त्र पढ्दै आफ्नी आमालाई प्रथमाञ्जली, द्वितीयाञ्जली, तृतीयाञ्जली दिने  :-               ॐ अद्येह अमुक गोत्राऽअस्मत् माता अमुक नाम्नीदेवी वसुस्वरुपास्तृप्यतामिदं तिलोदकं तस्यै स्वधा । इति माता प्रथमाञ्जली  दद्यात् ।                                                                                                                            आमाव्वाजस्य प्प्रसवो जगम्यादेमे द्यावापृथिवी व्विश्वरूपे । आमागन्तां पितरामातरा चःआमासोमो अमृततत्वेन गम्यात् ।                                                                                                                              ॐ अद्येह अमुक गोत्राऽअस्मत् माता अमुक नाम्नीदेवी वसुस्वरुपास्तृप्यतामिदं तिलोदकं तस्यै स्वधा । इति माता द्वितीयाञ्जली  दद्यात् ।                                                                                                            आमाव्वाजस्य प्प्रसवो जगम्यादेमे द्यावापृथिवी व्विश्वरूपे । आमागन्तां पितरामातरा चःआमासोमो अमृततत्वेन गम्यात् ।                                                                                                                              ॐ अद्येह अमुक गोत्राऽअस्मत् माता अमुक देवी वसुस्वरुपास्तृप्यतामिदं तिलोदकं तस्यै स्वधा । इति माता तृतीयाञ्जली  दद्यात् ।                                                                                                                        आमाव्वाजस्य प्प्रसवो जगम्यादेमे द्यावापृथिवी व्विश्वरूपे । आमागन्तां पितरामातरा चःआमासोमो अमृततत्वेन गम्यात् ।
हजुरआमालाई                                                                                                                                            १९ तलको मन्त्र पढ्दै आफ्नी हजुर आमालाई प्रथमाञ्जली, द्वितीयाञ्जली, तृतीयाञ्जली दिने :-          ॐ अद्येह अमुक गोत्राऽस्मत् पितामही अमुक नाम्नीदेवी रूद्रस्वरुपास्तृप्यतामिदं तिलोदकं तस्यै स्वधा । इति पितामही प्रथमाञ्जली  दद्यात् ।                                                                                                                  ॐ अद्येह अमुक गोत्राऽस्मत् पितामही अमुक नाम्नीदेवी रूद्रस्वरुपास्तृप्यतामिदं तिलोदकं तस्यै स्वधा । इति पितामही द्वितीयाञ्जली  दद्यात् ।                                                                                                                ॐ अद्येह अमुक गोत्राऽस्मत् पितामही अमुक नाम्नीदेवी रूद्रस्वरुपास्तृप्यतामिदं तिलोदकं तस्यै स्वधा। इति पितामही तृतीयाञ्जली  दद्यात् ।
आमाव्वाजस्य प्प्रसवो जगम्यादेमे द्यावापृथिवी व्विश्वरूपे । आमागन्तां पितरामातरा चःआमासोमो अमृततत्वेन गम्यात् । (विमातृ हजुरआमा भएमात्र)
ॐ अद्येह अमुक गोत्राऽस्मत् सपत्न्य पितामही अमुक नाम्नीदेवी रूद्रस्वरुपास्तृप्यतामिदं तिलोदकं तस्यै स्वधा । इति पितामही प्रथमाञ्जली  दद्यात् ।                                                                                              ॐ अद्येह अमुक गोत्राऽस्मत् सपत्न्य पितामही अमुक नाम्नीदेवी रूद्रस्वरुपास्तृप्यतामिदं तिलोदकं तस्यै स्वधा । इति पितामही द्वितीयाञ्जली  दद्यात् ।                                                                                            ॐ अद्येह अमुक गोत्राऽस्मत् सपत्न्य पितामही अमुक नाम्नीदेवी रूद्रस्वरुपास्तृप्यतामिदं तिलोदकं तस्यै स्वधा । इति पितामही तृतीयाञ्जली  दद्यात् ।                                                                                 आमाव्वाजस्य प्प्रसवो जगम्यादेमे द्यावापृथिवी व्विश्वरूपे । आमागन्तां पितरामातरा चःआमासोमो अमृततत्वेन गम्यात् ।
बुढीहजुरआमालाई                                                                                                                                  २० तलको मन्त्र पढ्दै आफ्नी बुढी हजुर आमालाई प्रथमाञ्जली, द्वितीयाञ्जली, तृतीयाञ्जली दिने    ॐ अद्येह अमुक गोत्राऽस्मत् प्रपितामही अमुक नाम्नीदेवी आदित्यस्वरुपास्तृप्यतामिदं तिलोदकं तस्यै स्वधा । इति प्रपितामही प्रथमाञ्जली  दद्यात् ।                                                                                                ॐ अद्येह अमुक गोत्राऽस्मत् प्रपितामही अमुक नाम्नीदेवी आदित्यस्वरुपास्तृप्यतामिदं तिलोदकं तस्यै स्वधा । इति प्रपितामही द्वितीयाञ्जली  दद्यात् ।                                                                                                   ॐ अद्येह अमुक गोत्राऽस्मत् प्रपितामही अमुक नाम्नीदेवी आदित्यस्वरुपास्तृप्यतामिदं तिलोदकं तस्यै स्वधा । इति प्रपितामही तृतीयाञ्जली  दद्यात् ।                                                                                             आमाव्वाजस्य प्प्रसवो जगम्यादेमे द्यावापृथिवी व्विश्वरूपे । आमागन्तां पितरामातरा चःआमासोमो अमृततत्वेन गम्यात् ।
मामाघर हजुरर्बालाई  मातामह                                                                                                              २१ तलको मन्त्रहरु पढ्दै मातामहलाई प्रथमाञ्जली दिने  :-                                                                    ॐ अद्येह अमुकगोत्रोऽस्मत् मातामहऽअमुकशर्मा वसुस्वरुपस्तृप्यतामिदं तिलोदकं तस्मै स्वधा । इति मातामहाय प्रथमाञ्जली  दद्यात् ।
ॐ नमो वः पितरो रसाय नमोव पितरः शोषाय नवो वः पितरो जीवाय नमो वः पितरः स्वधायै नमो वः पितारो घोराय नमो वः पितरो मन्ववे नमो वः पितरः पितरो नमो वोः गृहान्नः पितरो दत्त सतो वः पितरो देष्मैतद्वः पितरो वासः ।
२२ तलको मन्त्रहरु पढ्दै मातामहलाई द्वितीयाञ्जली दिने :-                                                                     ॐ अद्येह अमुकगोत्रोऽस्मत् मातामहऽअमुकशर्मा वसुस्वरुपस्तृप्यतामिदं तिलोदकं तस्मै स्वधा । इति मातामहाय द्वितीयाञ्जली  दद्यात् ।                                                                                                            ॐ नमो वः पितरो रसाय नमोव पितरः शोषाय नवो वः पितरो जीवाय नमो वः पितरः स्वधायै नमो वः पितारो घोराय नमो वः पितरो मन्ववे नमो वः पितरः पितरो नमो वोः गृहान्नः पितरो दत्त सतो वः पितरो देष्मैतद्वः पितरो वासः ।                        
२३ तलको मन्त्रहरु पढ्दै मातामहलाई तृतीयाञ्जली दिने :-                                                                    ॐ अद्येह अमुकगोत्रोऽस्मत् मातामहऽअमुकशर्मा वसुस्वरुपस्तृप्यतामिदं तिलोदकं तस्मै स्वधा । इति मातामहाय तृतीयाञ्जली  दद्यात् ।                                                                                                                ॐ नमो वः पितरो रसाय नमोव पितरः शोषाय नवो वः पितरो जीवाय नमो वः पितरः स्वधायै नमो वः पितारो घोराय नमो वः पितरो मन्ववे नमो वः पितरः पितरो नमो वोः गृहान्नः पितरो दत्त सतो वः पितरो देष्मैतद्वः पितरो वासः ।
मामाघर बुढा हजुर्बा प्रमातामह                                                                                                                 २४ तलको मन्त्रहरु पढ्दै प्रमातामहलाई प्रथमाञ्जली दिने  :-                                                                 ॐ अद्येह अमुकगोत्रोऽस्मत् प्रमातामहऽअमुक्रशर्मा रूद्रस्वरुपस्तृप्यतामिदं तिलोदकं तस्मै स्वधा । इति प्रमातामहाय प्रथमाञ्जली दद्यात् ।                                                                                                                ॐ नमो वः पितरो रसाय नमोव पितरः शोषाय नवो वः पितरो जीवाय नमो वः पितरः स्वधायै नमो वः पितारो घोराय नमो वः पितरो मन्ववे नमो वः पितरः पितरो नमो वोः गृहान्नः पितरो दत्त सतो वः पितरो देष्मैतद्वः पितरो वासः ।
२५ तलको मन्त्रहरु पढ्दै प्रमातामहलाई द्वितीयाञ्जली दिने  :-                                                                ॐ अद्येह अमुकगोत्रोऽस्मत् प्रमातामहऽअमुक्रशर्मा रूद्रस्वरुपस्तृप्यतामिदं तिलोदकं तस्मै स्वधा । इति प्रमातामहाय द्वितीयाञ्जली  दद्यात् ।                                                                                                          ॐ नमो वः पितरो रसाय नमोव पितरः शोषाय नवो वः पितरो जीवाय नमो वः पितरः स्वधायै नमो वः पितारो घोराय नमो वः पितरो मन्ववे नमो वः पितरः पितरो नमो वोः गृहान्नः पितरो दत्त सतो वः पितरो देष्मैतद्वः पितरो वासः ।
२६ तलको मन्त्रहरु पढ्दै प्रमातामहलाई तृतीयाञ्जली दिने  :-                                                               ॐ अद्येह अमुकगोत्रोऽस्मत् प्रमातामहऽअमुक्रशर्मा रूद्रस्वरुपस्तृप्यतामिदं तिलोदकं तस्मै स्वधा। इति प्रमातामहाय तृतीयाञ्जली  दद्यात् ।                                                                                                              ॐ नमो वः पितरो रसाय नमोव पितरः शोषाय नवो वः पितरो जीवाय नमो वः पितरः स्वधायै नमो वः पितारो घोराय नमो वः पितरो मन्ववे नमो वः पितरः पितरो नमो वोः गृहान्नः पितरो दत्त सतो वः पितरो देष्मैतद्वः पितरो वासः ।
मामाघर खुढा हजुर्बा बृद्धप्रमातामह                                                                                                        २७ तलको मन्त्रहरु पढ्दै बृद्ध प्रमातामहलाई प्रथमाञ्जली दिने  :-                                                         ॐ अद्येह अमुकगोत्रोऽस्मत् बृद्धप्रमातामहऽअमुक शर्मा आदित्यस्वरुपस्तृप्यतामिदं तिलोदकं तस्मै स्वधा । इति बृद्धप्रमातामहाय प्रथमाञ्जली  दद्यात् ।                                                                                                  ॐ नमो वः पितरो रसाय नमोव पितरः शोषाय नवो वः पितरो जीवाय नमो वः पितरः स्वधायै नमो वः पितारो घोराय नमो वः पितरो मन्ववे नमो वः पितरः पितरो नमो वोः गृहान्नः पितरो दत्त सतो वः पितरो देष्मैतद्वः पितरो वासः ।                                                                                                                              २८ तलको मन्त्रहरु पढ्दै बृद्ध प्रमातामहलाई द्वितीयाञ्जली दिने  :-                                                        ॐ अद्येह अमुकगोत्रोऽस्मत् बृद्धप्रमातामहऽअमुक शर्मा आदित्यस्वरुपस्तृप्यतामिदं तिलोदकं तस्मै स्वधा । इति बृद्धप्रमातामहाय द्वितीयाञ्जली  दद्यात् ।                                                                                             ॐ नमो वः पितरो रसाय नमोव पितरः शोषाय नवो वः पितरो जीवाय नमो वः पितरः स्वधायै नमो वः पितारो घोराय नमो वः पितरो मन्ववे नमो वः पितरः पितरो नमो वोः गृहान्नः पितरो दत्त सतो वः पितरो देष्मैतद्वः पितरो वासः ।
२९ तलको मन्त्रहरु पढ्दै बृद्ध प्रमातामहलाई तृतीयाञ्जली दिने :-                                                         ॐ अद्येह अमुकगोत्रोऽस्मत् बृद्धप्रमातामहऽअमुक शर्मा आदित्यस्वरुपस्तृप्यतामिदं तिलोदकं तस्मै स्वधा । इति बृद्धप्रमातामहाय तृतीयाञ्जली  दद्यात् ।                                                                                               ॐ नमो वः पितरो रसाय नमोव पितरः शोषाय नवो वः पितरो जीवाय नमो वः पितरः स्वधायै नमो वः पितारो घोराय नमो वः पितरो मन्ववे नमो वः पितरः पितरो नमो वोः गृहान्नः पितरो दत्त सतो वः पितरो देष्मैतद्वः पितरो वासः ।
मामाघर आँबै मातामही                                                                                                                          ३० तलको मन्त्रहरु पढ्दै मातामहीलाई प्रथमाञ्जली, द्वितीयाञ्जली, तृतीयाञ्जली दिने :-                    ॐ अद्येह अमुकगोत्राऽस्मन्मातामही अमुक नाम्नी देवी वसुस्वरुपास्तृप्यतामिदं तिलोदकं तस्यै स्वधा ३ । इति मातामही प्रथमाञ्जली  द्वितीयाञ्जली तृतीयाञ्जली दद्यात् ।                                                                  ॐ आमाव्वाजस्य प्प्रसवो जगम्यादेमे द्यावापृथिवी व्विश्वरूपे । आमागन्तां पितरामातरा चःआमासोमो अमृततत्वेन गम्यात् ।
मामाघर बुढीआँबै प्रमातामही                                                                                                                    ३१ तलको मन्त्रहरु पढ्दै प्रमातामहीलाई प्रथमाञ्जली, द्वितीयाञ्जली, तृतीयाञ्जली दिने  :-               ॐ अद्येह अमुकगोत्राऽअस्मस्मत् प्रमातामही अमुक नाम्नी देवी रूद्रस्वरुपास्तृप्यतामिदं तिलोदकं तस्यै स्वधा ३ । इति प्रमातामही प्रथमाञ्जली  द्वितीयाञ्जली तृतीयाञ्जली दद्यात् ।                                                  ॐ आमा वाजस्य प्रसवो जगम्यादेमे द्यावापृथिवी विश्वरूपे ।  आमा गन्ता पितारामातरा चामा सोमोऽअमृतत्वेन गम्यात् ।।
मामाघर झन् बुढीआँबै बृद्धप्रमातामही                                                                                                   ३२ तलको मन्त्रहरु पढ्दै बृद्ध प्रमातामहीलाई प्रथमाञ्जली, द्वितीयाञ्जली, तृतीयाञ्जली दिने  :-         ॐ अद्येह अमुकगोत्राऽस्मस्मद् बृद्धप्रमातामही अमुक नाम्नी देवी आदित्यस्वरुपास्तृप्यतामिदं तिलोदकं तस्यै स्वधा ३ । इति बृद्धप्रमातामही प्रथमाञ्जली  द्वितीयाञ्जली तृतीयाञ्जली दद्यात् ।                                     ॐ आमा वाजस्य प्रसवो जगम्यादेमे द्यावापृथिवी विश्वरूपे ।  आमा गन्ता पितारामातरा चामा सोमोऽअमृतत्वेन गम्यात् ।।
बाँकी अन्य
विमातृ ठूलीआमालाई
ॐ अद्येह अमुक गोत्राऽअस्मत् ज्येष्ठमाता अमुक नाम्नीदेवी वसुस्वरुपास्तृप्यतामिदं तिलोदकं तस्यै स्वधा । इति माता प्रथमाञ्जली  दद्यात् ।                                                                                                                      ॐ अद्येह अमुक गोत्राऽअस्मत् ज्येष्ठमाता अमुक नाम्नीदेवी वसुस्वरुपास्तृप्यतामिदं तिलोदकं तस्यै स्वधा । इति माता द्वितीयाञ्जली  दद्यात् ।                                                                                                           ॐ अद्येह अमुक गोत्राऽअस्मत् ज्येष्ठमाता अमुक नाम्नीदेवी वसुस्वरुपास्तृप्यतामिदं तिलोदकं तस्यै स्वधा । इति माता तृतीयाञ्जली  दद्यात्
आमाव्वाजस्य प्प्रसवो जगम्यादेमे द्यावापृथिवी व्विश्वरूपे । आमागन्तां पितरामातरा चःआमासोमो अमृततत्वेन गम्यात् ।
१. जेठाबाबु कान्छाबाबुलाई सपत्निकानां ।                                                                                                    ॐ अद्येहकाश्यपगोत्रोऽस्मत् ज्येष्ठपिता तुलसिराम शर्मा बसुस्वरुपस्तृप्यतामिदं तिलोदकं तस्मै स्वधा । इति प्रथमाञ्जली  द्वितीयाञ्जली तृतीयाञ्जली दद्यात् ।
२.     ॐ अद्येह अमुक गोत्रोऽस्मत् ज्येष्ठ÷मध्यम÷कनिष्ठ पिता अमुकशर्मा बसुस्वरुपस्तृप्यतामिदं तिलोदकं तस्मै स्वधा । इति प्रथमाञ्जली  द्वितीयाञ्जली तृतीयाञ्जली दद्यात् ।                                    
३. ॐ अद्येह अमुक गोत्रोऽअस्मत् मातुल ऽअमुक शर्मा सपत्निकानां बसुस्वरुपस्तृप्यतामिदं तिलोदकं तस्मै स्वधा । इति प्रथमाञ्जली  द्वितीयाञ्जली तृतीयाञ्जली दद्यात् ।                                                                          ४. ॐ अद्येह अमुकगोत्रोऽअस्मत् ज्येष्ठभ्राता÷मध्यमभ्राता÷कनिष्ठभ्राता ऽअमुक शर्मा बसुस्वरुपस्तृप्यतामिदं तिलोदकं तस्मै स्वधा । इति प्रथमाञ्जली द्वितीयाञ्जली तृतीयाञ्जली दद्यात् ।  
५.   ॐ अद्येह अमुकगोत्रोऽअस्मत् पितृशोषा ऽअमुक नाम्नीदेव्या सापत्यं बसुस्वरुपयास्तृप्यतामिदं तिलोदकं  तस्यै स्वधा । इति प्रथमाञ्जली  द्वितीयाञ्जली तृतीयाञ्जली दद्यात् ।                                            
६.     ॐ अद्येह अमुक गोत्राःऽअस्मत् ज्येष्ठ÷मध्यम÷कनिष्ठ भगिनी ऽअमुक नाम्नीदेव्या बसुस्वरुपयास्तृप्यतामिदं तिलोदकं तस्यै स्वधा । इति प्रथमाञ्जली  द्वितीयाञ्जली तृतीयाञ्जली दद्यात् ७.     ॐ अद्येह अमुक गोत्रोऽअस्मत् जायपिता ऽअमुक शर्मणो बसुस्वरुपयास्तृप्यतामिदं तिलोदकं तस्मै स्वधा । इति प्रथमाञ्जली  द्वितीयाञ्जली तृतीयाञ्जली दद्यात्                                                                                  ८.    ॐ अद्येह अमुकगोत्रोऽअस्मत् गायत्री गुरु ऽअमुक शर्मणो बसुस्वरुपयास्तृप्यतामिदं तिलोदकं तस्मै स्वधा । इति प्रथमाञ्जली  द्वितीयाञ्जली तृतीयाञ्जली दद्यात् ।
१०. ॐ अद्येह अमुक गोत्रोऽअस्मत् दीक्षा गुरु ऽअमुक शर्मणो बसुस्वरुपयास्तृप्यतामिदं तिलोदकं तस्मै स्वधा । इति प्रथमाञ्जली  द्वितीयाञ्जली तृतीयाञ्जली दद्यात् ।
मरेका समस्त पितृहरूको निमित्त तर्पण दिने क्रम यसप्रकार छः- 
श्लोकमा
ताताम्बात्रियतं सपत्नजननी मातामहादित्रयं । सस्त्रि स्त्रीतनयादि तातजननीस्वभ्रातरः सस्त्रियः ।।                  ताताम्बात्म भगिन्य पत्यधवयुग जायापिता सद्गुरुः । शिष्याप्ताः पितरो महालयविधौ तीर्थे तथा तर्पणे ।।          ॐ आब्रम्हतम्बपर्यन्तं देवर्षिपितृमानवाः । तृप्यन्तु पितरः सर्वे मातृमातामहादयः ।।                                   पितृवंशे मृता ये च मातृवंशे तथैव च । गुरुश्वशुरबन्धूनां ये चान्ये वान्धवा मृताः ।।                                        ते तृप्तिमखिला यान्तु ये चास्मत्तोयकाङ्क्षिणः । ये बान्धवाऽबान्धवा येऽन्यजन्मनि बान्धबाः ।।                       ते सर्वे तृप्तिमायन्तु मद्दत्तेनाम्बुनाऽखिलाः । देवासुरास्तथा यक्षा नागा गन्दर्व राक्षसाः ।।                              पिशाचा गुह्यकाः सिद्धाः कूष्माण्डास्तरवः खगाः । जलेचरा भूमिचरा वा्यवाहाराश्चजन्तवः ।।                             ते तृप्तिमखिला यान्तु मद्दत्तेनाम्बुनाऽखिलाः । नरकेषुसमस्तेषु यातनाषु च ये स्थिताः ।। तेषामाप्यायनायैतद्दीयते सलिल्रं मया । अतीतकुलकोटीनां सप्तद्वीपनिवासिनां ।।  आब्रम्हभुवनाँल्लोकानिदमस्तु तिलोदकम् । यत्र क्वचन संस्थानां क्षुतिृष्णोपहतात्मनाम् ।। यदंक्ष्ययमेवास्तु मयादत्तंं तिलोदकम्  ।।
भाषामा
पिता, पितामह र प्रपितामहँ३=३, माता, पितामही, प्रपितामहीँ३ =६, सौतेनी आमा १=७, मतामह, प्रमातामह, बृद्धप्रमातामह ३=१०, मातामही, प्रमातामही, बृद्धप्रमातामही ३=१३, आफ्नी धर्मपत्नी १=१४, छोराछोरी (कतिवटालाई दिनु पर्ने हो सोही अनुसार गणना गर्ने ) १,=१५, जेठाकान्छ बाबु सपत्नीक                    (कतिवटालाई दिनु पर्ने हो सोही अनुसार गणना गर्ने)  १=१६, मामा, माइजु  (कतिवटालाई दिनु पर्ने हो सोही अनुसार गणना गर्ने)२=१८, आफ्ना दाइ, भाई र उनका पत्नी (भाउजु)सपत्नीक (कतिवटालाई दिनु पर्ने हो सोही अनुसार गणना गर्ने)=२, पति पुत्र सहितका फुपू सापत्यक (कतिवटालाई दिनु पर्ने हो सोही अनुसार गणना गर्ने) १=१९, पति, पुत्र सहितको सानी, ठूली आमा(कतिवटालाई दिनु पर्ने हो सोही अनुसार गणना गर्ने) १=२०, पति, पुत्र सहितका दिदीबहिनी सापत्यक (कतिवटालाई दिनु पर्ने हो सोही अनुसार गणना गर्ने) १=२१, सासू स्वसुरा २=२३, गायत्री गुरु १=२४, वेद दीक्षा गुरु १=२५, शिष्य १=२६ ।                                                              

३३ तलको मन्त्र पढ्ने र कर्ताले अटुटरुपमा तर्पण जलधारा लगाइरहने:-                                                ॐ आब्रह्मस्तम्बपर्यन्तं देवर्र्षििपतृमानवाः । तृप्यन्तु पितरः सर्वे मातृमातामहादयः ।।                                  पितृवंशे मृता ये च मातृवंशे तथैव च । गुरुस्वसुरबन्धूनां ये चान्ये बान्धवा मृताः ।।                                      ते तृप्तिमखिलं यान्तु ये चास्मतोयकाङ्क्षिण । ये बान्धवाबान्धवा वा येऽन्यजन्मनि बान्धवाः ।। ते सर्वे तृप्तिमायान्तु मद्देनाम्बुनाखिलाः । देवासुरा तथा यक्षा नागा गन्दर्भराक्षसा ।। पिशाचा गुह्यकाःसिद्धः कुष्माण्डास्तरवः खगाः । जलेचरा भूमिचरा वाय्वाहाराश्च जन्तवः ।। ते तृप्तिमखिला यान्तु मद्दत्तेनाम्बुनाखिला । नरकेषु समस्तेषु यातनासु च ये स्थिताः । तेषामाप्यायनायैतद्दीयते सलिलं मया । अतीतकुलकोटिनां सप्तद्वीपनिवासिनाम् ।। ॐ आब्रह्मभुवनाँल्लोकानिदमस्तु तिलोदकम् ।यत्रक्वचन संंस्थानां क्षुत्तुष्णोमहतात्ममान् ।। इदमक्षय्यमेवास्तु मया दत्तं तिलोदकं ।
बस्त्रनिष्पीडनम्                                                                                                                                          ३४. ब्राम्हणले तलको मन्त्र पढ्ने कर्ताले जनैको शिखा तर्पण दिएको भाँडाको पानीमा भिजाएर बहिपटि निचोरी दिने :-
ॐ ये के चास्मत्कुले जाता अपुत्रा गोत्रिणो मृता । ते पिवन्तु मयादत्तं बस्त्रनिष्पीडनोदकम् ।।
ब्रम्हादिको पूजा                                                                                                                                          ३५ तलको मन्त्रले सव्य भएर आचमन गर्ने अनि पूर्व फर्केर तर्पण दिएको जलपात्रमा ब्रम्हादिको पूजागर्ने  :-
ब्रम्हाको पूजा
ॐ ब्रम्ह जज्ञानं प्रथमं पुरस्ताद्विसीमतः सुरुचो बेनऽआवः ।  सबुध्न्याऽउपमाऽअस्य विष्ठाः शतश्चयोनिमशतश्च व्विव ।। ॐ ब्रम्हणे नामः ।                                                                                                                                                                                               विष्णुको पूजा                                                                         ॐ इदं विष्णुविचक्रमे त्रेधा निदधे पदम् । समूढमस्यपा ʊसुरे स्वाहा ।। ॐ विष्णवे नमः ।                                                                                                  रुद्रको पूजा                                                                               ॐ नमस्ते रुदमन्यबऽउतोतऽइषवे नमः । बाहुभ्या मूतते नमः । ॐ रुद्राय नमः ।                                                                                   सावित्रीको पूजागर्ने                                                                                                   ॐ भूर्भुवः स्वः तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि । धियो यो नः प्रचोदयात् ।।  ॐ सावित्रै नमः ।                                                              मित्रको पूजागर्ने                                                                                         ॐमित्रस्य चर्षणी धृतो वो देवस्य सानसि । द्युम्नं चित्रश्रवस्तमम् । ॐ मित्राय नमः ।                                                                               बरुणको पूजागर्ने                                                                                         ॐ वरुणसेत्तम्भनमसि वरुणस्य स्कम्भसर्जनीस्थो वरुणस्य ऋतसदन्यसि । ॐ वरुणाय नमः । े
सूर्यलाई अर्ध दिने मन्त्र नं.                                                                                                                         ३६ तलको मन्त्र पढ्ने र सूर्यलाई अर्घ दिने
ॐ एहि सूर्य सहस्रांशो तेजोराशे जगत्पते । अनुकम्पयमां भक्त्या गृहाणाघ्र्यं दिवाकर ।।
३७ को मन्त्र पढेर सूर्यलाई उपस्थान गर्ने :-                                                                                                ॐ अदृश्रमस्य केतवो विरश्मयो जनाँ ऽअनु । भ्राजन्तोऽअग्नयो यथा । उपयामगृहितोसि                     सूर्यायत्वाब्भ्राजिस्टस्त्वन्देवेष्वसि ब्भ्राजिष्ठोहम्मनुष्येषु भूयासम् । ॐ हǵसः शुतिषद्धसुरन्तरिक्षसद्धोता वेदिषदतिथिर्दुरोणसत् । नृषद्वरसदृतस व्योमसदव्जागोजाऽऋतजाऽअद्रिजा ऋतम्बृहत् ।                                सूर्य उपस्थान
दिशां दिग्देवानाञ्च प्रणमनम्                                                                                                                   ३८ असनबाट उठेर तलको मन्त्र पढ्दै दायाँतर्फबाट सबै दिशालाई घुमेर नमस्कार गर्दै जाने  :-              ॐ प्राच्यै दिशे नमः ॐ इन्द्राय नमः ..ॐ आग्नेयैै दिशे नमः ॐ अग्नये नमः ॐ दक्षिणायै दिशे नमः ॐ यमाय  नमः  ..ॐ नैऋत्यैै दिशे नमः  ..ॐ निऋतये नमः ॐ प्रतिच्यैै दिशे नमः  ॐ वरुणाय नमः  ॐ वायव्यै दिशे नमः  ॐ वायवे नमः  ॐ उदिच्यैै दिशे नमः  ॐ कुवेराय नमः  ॐ ऐशान्यै दिशे नमः  ॐ इशानाय दिशे नमः  ॐ उध्र्वायैै दिशे नमः  ॐ ब्रम्हणे नमः  ॐ अधो दिशे नमः  ॐ अनन्तायै दिशे नमः  ।                                                                                                
३९ आसनमा बसेर तलको  मन्त्रहरुपढ्दै नमस्कार गर्ने  :-                                                                         ॐ ब्रम्हणे नामः, ॐ अग्नये नामः, ॐ र्प्थिव्यैे नामः, ॐ ओषीभ्योे नामः, ॐ वाचस्पतये नामः, ॐ विष्णवे नामः, ॐ महद्भ्योे नामः, ॐ अद्भ्यो नामः, ॐ अपां पतये नामः, ॐ वरुणाये नामः,
मुखविमर्शनम्                                                                                                                                               ४० तर्पण दिएको जल हातले चलाउदै तलको मन्त्र पढ्ने :-                                                                    ॐ संवर्चसा लपयसा सन्तनूभिरगन्मही मनसा स ǵशिवेन ।                                                                   त्वष्टा सुदत्रो विदधातु रायोनुमाष्र्टु तन्वो यद्विलिष्टम् ।।
चक्षु स्पर्शः                                                                                                                                                    ४१ तलको मन्त्र पढेर तर्पण दिएको जल बुढी र साइलि औंलाले चलाएर आँखामा लगाउने :-               ॐ तच्चक्षुर्देवहितं पुरस्ताच्छुक्रमुच्चरत् । पश्येम शरदः शतं जीवेम शरदः शतǵशृणुयाम शरदः शतं परब्रवाम पश्येम शरदः शतं जीवेम शरदः शतमदीना स्याम शरदः शतं भूयश्च शरदः शतात् ।।                        
पितृ विसर्जनम्
४२..तलको पढेर तर्पण दिएको पात्र र तर्पणपात्र राखेको कुशहरु उठाएर पर सारी विषर्जन गरी दिने :   ॐ देवागातुविदोगातुं वित्वागातुमित । मनसस्पत इमं देवयज्ञ ǵस्वाहा वातेधा ।
इति तर्पणविधिः समाप्त


पार्वण श्राद्धविधि आरम्भ
माथि लेखिएको विधि अनुसार तर्पण सकिएपछि पार्वण श्राद्ध शुरू गर्नु पर्छ । कर्ताले उत्तरबाट दक्षिण तर्फ फर्किएर वस्ने र दुईवटा विश्वेदेव ब्राम्हण पश्चिमबाट पूर्व फर्काएर राख्ने र र्दुवटा पितृ ब्राम्हण दक्षिणबाट उत्तर फर्काएर राख्ने । दुवैतर्फका ब्राम्हणको बीचमा दक्षिण फर्काएर बत्ति बाल्नु पर्छ । कर्ताले आफ्ना अगाडि पूजा सामग्री राखी, आचमन, प्राणायाम गर्नु र दीप प्रज्वलन गरेर पुजा आरम्भ गर्नु पर्दछ ।
कर्ताले शुद्ध भई आसनमा बस्ने र आचमन गरी तलको मन्त्र पढेर दीप प्रज्वलन गरी अक्षता, धूप, दीप, नैवेद्य, भेटी चढाएर दीयोको पूजा गर्नेः ँ                                                                                                                    हरि ॐ नमोऽस्त्वनन्ताय सहस्रमूर्तये सहस्रपादाक्षिशिरोरुवाहवे ।                                                                 सहस्रनाम्ने पुरुषाय शाश्वते सहस्रकोटि युगधारिणे नामः ।। ॐ कर्मसाक्षिणे दीपनारायणाय नमः ।
प्रार्थानाँ ॐ नमः कमलनाभाय नमस्ते जलशायिने । नमस्ते केशवानन्द बासुदेव नमोस्तु ते ।। वासद्द्वासुदेवस्य वासितं भुवनत्रयम् । सर्वभूतनिवासोसि वासुदेव नमोस्तु ते ।।                                        शुभं भवतु कल्याणमारोग्यं सुखसम्पदः । मम शत्रुविनासाय दीपज्योतिर्नमोस्तु ते ।।                                            ॐ नमो ब्रम्हण्यदेवाय गोब्राम्हणहिताय च । जगद्धिताय कृष्णाय गोविन्दाय नमो नमः ।।
पार्वण श्राद्धमा कर्ताको अगाडि दक्षिणबाट उत्तर फर्काएर दुईवटा पितृ ब्राम्हण (पितृकुल र मातृ कूलका लागि) र कर्ताको बायाँ पश्चिमबाट पूर्व फर्काएर दुइबाट विश्वेदेव ब्राम्हण (पितृकुल र मातृ कूलका लागि) राख्नु पर्छ ।
कुश ब्रम्हणको प्राणप्रतिष्ठाः
१. न्यूनतम पाँचवटा कुशको दुइवटा विश्वेदेव ब्रम्हण र दुइवटा पितृ ब्राम्हण बनाई तिलको तेल लगाई जलले स्नान गराउने र तलको मन्त्रले चन्दन अक्षता पूmलले चारवटै ब्राम्हणलाई छुट्टाछुट्टै पूजा गरेर कुश ब्राम्हणको प्राणप्रतिष्ठा गर्नुपर्छ ।
प्राणप्रतिष्ठा गर्ने मन्त्रः- ॐ मनोजूतिज्र्जूषतामाज्ज्यस्बृहस्पत्यिर्यज्ञमिमन्तनोत्वरिष्टं्ययज्ञǵसमिमन्दधातु । व्विश्श्वेदेवासऽइहमादयन्तामाँॐ प्रतिष्ठ ।।
२. सव्यमा नै कर्ताले पश्चिम तर्फ फर्कने र दाहिने गोडा तेर्सो पारेर बायाँ हातले पितृकुलका विश्वेदेवलाई छुने र दायाँ हात घोप्टो पारेर विश्वेदेव ब्राम्हणलाई जनै, पानसुपारी राख्दै नं. २ को मन्त्र पढ्ने  ब्राम्हणलाई निमन्त्रणा गर्नेः-                                              
ॐ अद्येह अमुक सगोत्राणां अस्पत्पितृपितामहप्रपितामहानां अमुक अमुक शर्मणानां सपत्नीकानां वसुरूद्रआदित्यस्वरूपाणां श्राद्धसम्बन्धिनांविश्वेषां देवानां पुरुरवामाद्रवानां अद्यकर्तव्य महालयपरपक्षान्तर्गत पार्वणश्राद्धे अनेन ताम्बूलगन्धपूषाक्षतेन त्वं मया निमन्त्रितः । ॐ निमन्त्रितोऽस्मि इति प्रतिवचनम् ।
३.पुनः सोहिप्रकारले तलको मन्त्र पढेर मातृ कुलका विश्वेदेव ब्राम्हणलाई निमन्त्रणा गर्नेः
ॐ अद्येह अमुक सगोत्राणां अस्मन्मातामहप्रमातामहबृद्धप्रमातामहानां  अमुक अमुक शर्मणानां सपत्नीकानां वसुरूद्रआदित्यस्वरूपाणां श्राद्धसम्बन्धिनांविश्वेषां देवानां पुरुरवामाद्रवानां अद्यकर्तव्य महालयपरपक्षान्तर्गत पार्वणश्राद्धे अनेन ताम्बूलगन्धपूषाक्षतेन त्वं मया निमन्त्रितः ।                                          ॐ निमन्त्रितोऽस्मि इति प्रतिवचनम् ।
४. त्यसपछि अपसव्य भएर वायाँ गोडा तेर्सो पारेर दक्षिणतर्फ फर्कने र दक्षिबाट उत्तरतर्फ फर्किएर बसेका पितृब्राम्हण (पहिले पितृकुलका) लाई बायाँ हातले उत्तानो पारेर छुने र दयाँ हातले जनै, पानसुपारी राख्दै तलको मन्त्र पढ्ने  ब्राम्हणलाई निमन्त्रणा गर्नेः-  
ॐ अद्येह अमुक सगोत्राणां अस्मत्पितृपितामहप्रपितामहानां अमुक अमुक शर्मणानां सपत्नीकानां वसुरूद्रआदित्यस्वरूपाणां अद्यकर्तव्य महालयपरपक्षान्तर्गत पार्वणश्राद्धे अनेन ताम्बूलगन्धपूषाक्षतेन त्वं मया निमन्त्रितः । ॐ निमन्त्रितोऽस्मि इति प्रतिवचनम् ।
५.पुनः सोहिप्रकारले तलको मन्त्र पढेर मातृ कुलका पितृ ब्राम्हणलाई निमन्त्रणा गर्नेः-
ॐ अद्येह अमुक सगोत्राणां अस्मन्मातामहप्रमातामहबृद्धप्रमातामहानां अमुक अमुक शर्मणानां सपत्नीकानां वसुरूद्रआदित्यस्वरूपाणां अद्यकर्तव्य महालयपरपक्षान्तर्गत पार्वणश्राद्धे अनेन ताम्बूलगन्धपूषाक्षतेन त्वं मया निमन्त्रितः । ॐ निमन्त्रितोऽस्मि इति प्रतिवचनम् ।              
६.अंञ्जलीवद्ध गरेर तलको मन्त्र पढ्ने ।                                                                                                    ॐ अक्रोधनैः शौचपरैः सततं ब्रम्हवादिभिः ।  भवितव्यं भवद्भिश्च मया च श्राद्धकारिणा ।।                      सर्वायासविनिर्मुक्तैः कामक्रोध विवर्जितैः । भवितव्यंभविद्भिर्नोऽद्यतने श्राद्धकर्मणि ।। ॐ भवितव्यम् । इति प्रतिवचनम्
पादार्घः-
७.सव्य भएर तलको मन्त्र पढ्दै  पूmल र कुशका टुक्राले ब्राम्हणको पाउ धुने (ब्राम्हणको अगाडि एउटा दुनामा जल राख्ने र कुश र पूmलले दुनाको जल विश्वेदेव ब्राम्हणलाई सेचन गर्ने-
हरि ॐ नमोऽस्त्वनन्ताय सहस्रमूर्तये सहस्रपादाक्षिशिरोरुवाहवे ।                                                                      सहस्रनाम्ने पुरुषाय शाश्वते सहस्रकोटि युगधारिणे नामः ।।                                                                   नमो ब्रम्हण्यदेवाय गोब्राम्हणहिताय च । जगतद्धिताय कृष्णाय गाविन्दाय नमो नमः ।।                                
८.फेरी त्यसैगरी तलको मन्त्र पढेर अर्का विश्वेदेव ब्राम्हणको पाउ धुने -
हरि ॐ नमोऽस्त्वनन्ताय सहस्रमूर्तये सहस्रपादाक्षिशिरोरुवाहवे ।                                                           सहस्रनाम्ने पुरुषाय शाश्वते सहस्रकोटि युगधारिणे नामः ।।            v                                                      नमो ब्रम्हण्यदेवाय गोब्राम्हणहिताय च । जगतद्धिताय कृष्णाय गाविन्दाय नमो नमः ।।
९. बायाँ हातमा दुनामा जल लिने र दायाँल हातमा कुशको टुक्रा लिएर तलको मन्त्र पढेर ब्राम्हणलाई जल चढाउनेः-
ॐ  शन्नेदेवीरभिष्टय आपो भवन्तु पीतये । संयोरभिश्रवन्तु नः ।
ॐ अद्येह अमुक सगोत्राणां अस्मत्पितृपितामहप्रपितामहानां अमुक अमुक शर्मणानां सपत्नीकानां वसुरूद्रआदित्यस्वरूपाणां  अद्यकर्तव्य महालयपरपक्षान्तर्गत पार्वणश्राद्धे श्राद्धे सम्बन्धिनो विश्वेदेवाः पुरूरवो माद्रवोनामानः एष पादार्घो वः स्वधा ।
१०. तलको मन्त्र पढेर पुनः अर्का विश्वेदेवलाई पादार्घ चढाउनेः - 
ॐ अद्येह अमुक सगोत्राणां अस्मन्मातामहप्रमातामहबृद्धप्रमातामहाना ं अमुक अमुक शर्मणानां सपत्नीकानां वसुरूद्रआदित्यस्वरूपाणां  अद्यकर्तव्य महालयपरपक्षान्तर्गत पार्वणश्राद्धे श्राद्धे सम्बन्धिनो विश्वेदेवाः पुरूरवो माद्रवोनामानः एष पादार्घो वः स्वधा ।
११. अपसव्य भएर  पितृ ब्राम्हणको अगाडि दुनामा जल राख्ने र तलको मन्त्र पढ्दै पितृकुलका पितृ ब्राम्हणको पाउ धुनेः-
हरि ॐ नमोऽस्त्वनन्ताय सहस्रमूर्तये सहस्रपादाक्षिशिरोरुवाहवे ।                                                                    सहस्रनाम्ने पुरुषाय शाश्वते सहस्रकोटि युगधारिणे नामः ।।                                                                   यत्फले कपिलादाने कातिक्यां ज्येष्ठ पुष्करे ।                                                                                                  तत्फलं पाण्डवश्रेष्ट विप्राणां पादशौचने ।
१२. बायाँ हातमा दुनामा पानि लिने दायाँ हातमा मोटक लिएर तलको मन्त्र र संकल्प पढेर दुनाको जल पितृकुलका पितृब्राम्हणलाइ चढाउनेः-                                                                                
ॐ  शन्नेदेवीरभिष्टय आपो भवन्तु पीतये । संयोरभिश्रवन्तु नः ।
ॐ अद्येह अमुक सगोत्राणां अस्मत्पितृपितामहप्रपितामहानां अमुक अमुक शर्मणानां सपत्नीकानां वसुरूद्रआदित्यस्वरूपाणां  अद्यकर्तव्य महालयपरपक्षान्तर्गत पार्वणश्राद्धे श्राद्धे एषपादार्घस्त्रेधा विभज्य युष्मभ्यं स्वधा ।
१३. बायाँ हातमा दुनामा पानि लिने दायाँ हातमा मोटक लिएर तलको मन्त्र र संकल्प पढेर दुनाको जल मातृकुलका पितृब्राम्हणलाई चढाउनेःँ -                                                                              
ॐ  शन्नेदेवीरभिष्टय आपो भवन्तु पीतये । संयोरभिश्रवन्तु नः ।
ॐ अद्येह अमुक सगोत्राणां अस्मन्मातामहप्रमातामहबृद्धप्रमातामहानां अमुक अमुक शर्मणानां सपत्नीकानां वसुरूद्रआदित्यस्वरूपाणां  अद्यकर्तव्य महालयपरपक्षान्तर्गत पार्वणश्राद्धे श्राद्धे एषपादार्घस्त्रेधा विभज्य युष्मभ्यं स्वधा ।
 १४. सव्य भएर आचमन गर्ने र  तलको मन्त्र पढ्दै विश्वेदेव ब्राम्हणहरूलाई स्वागत गर्दै गृह प्रवेश गराउनेः र पश्चिमबाट पूर्व फर्काएर राख्ने:-
ॐ आगता यूयम् । ॐ सुस्वागता वयम् । ॐ इदमासनमास्याताम् । ॐ आस्यते इति  प्रतिवचनम् । ॐ भूर्भुवः स्वः इतिमन्त्रेण विश्वेदेव ब्राम्हणौ पूर्वाभिमुखो उपवेसयेत् ।
१५. त्यसपछि पुनः अपसव्य भएर तलको मन्त्र पढ्दै पितृकूल र मातृकूलका ब्राम्हणहरूलाई स्वागत गर्दै गृह  प्रवेश गराउनेः र दक्षिणबाट उत्तरतर्फ फर्काएर राख्ने :-                                                               ॐ आगता यूयम् । ॐ सुस्वागता वयम् । ॐ इदमासनमास्याताम् । ॐ आस्यते इति  प्रतिवचनम् । ॐ भूर्भुवः स्वः इतिमन्त्रेण पितृ ब्राम्हणौ उदङुमुखौ उपवेसयेत्  ।
कर्मपात्र निर्माण
१६.सव्य भएर आचमन गर्ने र तलका मन्त्रहरू पढ्दै  एउटा तामाको भाँडोमा कुशका टुक्र, मोटक पवित्र, जल, तिल, पूmल, चन्दन, अक्षता राखेर देवताहरुलाई आव्हान गरेर विश्वेदेव ब्राम्हणको पूजागर्ने कर्मपत्र निर्माण गर्नेः  ।  कर्ता:- कर्मपात्रमहं करिष्ये । ब्रम्हण:- करूस्व ।
मन्त्रँ ॐ यद्देवादेवहेडनन्देवाश्चक्रिमा वयम् ।                                                                                                    अग्निर्मा तस्मादेनसो विश्वान् मुञ्चत्वʊहसः ।।                                                                                           ॐ यदि दिमा यदि नक्तमेनाʊसि चक्रिमावयम् ।                                                                                          वायुर्मा तस्मादेनसो विश्वान् मुञ्चत्वʊहसः ।।                                                                                           ॐ यदि जाग्रद्यदि स्वप्नऽएना ʊ सि चक्रिमावयम् ।                                                                                       सूर्योर्मा तस्मादेनसो विश्वान् मुञ्चत्वʊहसः ।।                                                                                 कर्मपात्रमा मोटक पवित्र राख्ने मन्त्रःँॐ पवित्रेस्थो व्वैष्णव्व्यौसवितुर्वः प्रसव उत्पुनाम्यछिद्रेणपवित्रेण सूर्यस्य रश्मिभिः । तस्य ते पवित्रपते पवित्रपूतस्य यत्कामः पुने तच्छकेयम् ।                                                जल राख्ने मन्त्रःँ ॐ  शन्नेदेवीरभिष्टय आपो भवन्तु पीतये । संयोरभिश्रवन्तु नः ।
तिल राख्ने मन्त्रःँ ॐ तिलोसि सोमदैवत्यो गोसवो देवनिर्मितः । प्रत्नमत्भि पृक्तः स्वधयापितृन्लोकान् प्रिणाहि नः स्वाहा ।                                                                                                                                             फूल राख्ने मन्त्रःँ  श्रीश्चते लक्ष्मीश्च पत्न्यावहोरात्रे पाश्र्वे नक्षत्रााणि रुपपश्विनौ व्यात्तम् । इष्णानिषाणमुम्मऽइखाण सर्वलोकम्मऽइखाण ।                                                                                      चन्दन राख्ने मन्त्रःँ  गन्धद्वारादुराधर्षानत्यपुष्टाङ्करीषिणीम् । ईश्वरी सर्वभूतानाम् तामिहोपव्हयेश्रियम् ।        अक्षता राख्ने मन्त्रःँ ॐअक्षन्नमीमदन्त ह्यवप्रियाऽअधूषत । अस्तोषत स्वभानवो विप्रा नविष्ठया मती योजान्विन्द्रते हरी ।
१७. अपसव्य भएर माथिको विधि अनुसार पितृकूल र मातृ कूलका पितृ ब्राम्हणहणको पूजागर्ने कर्मपत्र निर्माण गर्नेःँ  कर्ता:- कर्मपात्रमहं करिष्ये । ब्रम्हणः करूस्व ।
मन्त्रँ ॐ यद्देवादेवहेडनन्देवाश्चक्रिमा वयम् ।                                                                                                   अग्निर्मा तस्मादेनसो विश्वान् मुञ्चत्वʊहसः ।।                                                                                         ॐ यदि दिमा यदि नक्तमेनाʊसि चक्रिमावयम् ।                                                                                    वायुर्मा तस्मादेनसो विश्वान् मुञ्चत्वʊहसः ।।                                                                                               ॐयदि जाग्रद्यदि स्वप्नऽएना ʊ सि चक्रिमावयम् ।                                                                                         सूर्योर्मा तस्मादेनसो विश्वान् मुञ्चत्वʊहसः ।।                                                                                           कर्मपात्रमा मोटक पवित्र राख्ने मन्त्रःँॐ पवित्रेस्थो व्वैष्णव्व्यौसवितुर्वः प्रसव उत्पुनाम्यछिद्रेणपवित्रेण सूर्यस्य रश्मिभिः । तस्य ते पवित्रपते पवित्रपूतस्य यत्कामः पुने तच्छकेयम् ।                                               जल राख्ने मन्त्रःँ ॐ  शन्नेदेवीरभिष्टय आपो भवन्तु पीतये । संयोरभिश्रवन्तु नः ।
तिल राख्ने मन्त्रः-ॐ तिलोसि सोमदैवत्यो गोसवो देवनिर्मितः । प्रत्नमत्भि पृक्तः स्वधयापितृन्लोकान् प्रिणाहि नः स्वाहा ।                                                                                                                                              फूल राख्ने मन्त्रःँ-  श्रीश्चते लक्ष्मीश्च पत्न्यावहोरात्रे पाश्र्वे नक्षत्रााणि रुपपश्विनौ व्यात्तम् । इष्णानिषाणमुम्मऽइखाण सर्वलोकम्मऽइखाण ।                                                                                      चन्दन राख्ने मन्त्रःँ  गन्धद्वारादुराधर्षानत्यपुष्टाङ्करीषिणीम् । ईश्वरी सर्वभूतानाम् तामिहोपव्हयेश्रियम् ।         अक्षता राख्ने मन्त्रः ँॐअक्षन्नमीमदन्त ह्यवप्रियाऽअधूषत । अस्तोषत स्वभानवो विप्रा नविष्ठया मती योजान्विन्द्रते हरी ।
१८. सव्य भएर तलको मन्त्र पढ्दै कर्मपात्रको जल र तीनटुक्रा कुश लिएर यज्ञको चारैतिर र आपूmलाई पनि छर्कन ।
ॐ अपवित्र पवित्रो वा सर्वास्थां गतोऽपि वा । यः स्मरेत् पुण्डरीकाक्षं स वाह्याभ्यान्तरः शुचिः । ॐ पुण्डरीकाक्षः पुनातु ।
१९ कर्ताले सव्यमा नै कुशपानी लिने र म अब यी सामग्रीहरुले अमुक अमुक गोत्रका पितृपक्ष र मातृपक्षका पितृहरुको र्पाणश्राद्ध गर्दछु भनेर मन्त्र पढ्दै प्रतित्रा संकल्प गर्नेःँ
अद्येह अमुक सगोत्राणां अस्मत्पितृपितामहप्रपिताणां अमुक अमुक  शर्मणानां सपत्निकानां वसुरूद्रआदित्य स्वरूपाणां तथा अमुक गोत्राणां  अस्मन्मातामहप्रमातामह बृद्धप्रमातानां अमुक अमुक शर्मणानां सपत्नीकानां  वसुरूद्रआदित्य स्वरूपाणां पुरूरवामाद्र्रवा नाम्नां विश्वेदवपूर्वकाणां अद्यकर्तब्य महालय परपक्षान्तर्गत पार्वण श्राद्धमेभिद्र्रव्यैरहं करिष्ये ।
२० संकल्प पछि हात जोडेर तलको मन्त्र तीन पटक पढ्नेः                                                                       देवताभ्यः पितृभ्यश्च महायोगिभ्य एव च । नमः स्वाहायै स्वधायै नित्यमेव नमोनमः ।।३ पटक                                
२१. कर्ताले सव्य भएर हात जोड्ने ब्राम्हणले तलको मन्त्र पढ्दै जानेः

 दिग्वन्धनम्
२२ दिग्वन्धनं र नीविवन्धनं:-अपसव्य भएर कर्ताले हातमा मोटक र तिल लिने र प्रत्येक दिशामा मोटकले तिल झार्दै जाने, ब्राम्हणले तलको मन्त्र पढ्दै जाने .                                                                  ॐ अग्निखत्ता पितृगणाः प्रचीं रक्षतु मे दिशम् । ॐ अपहताऽअसुरा रक्षाʊसि वेदिषदः ।।   पूर्व तिर                  ॐ बर्हिषदः पान्तु याम्यां ये पितरः स्थिताः । ॐ अपहताऽअसुरा रक्षाʊसि वेदिषदः ।। दक्षिणमा छर्ने ।             ॐ प्रतीचीमाज्यपास्तद्वत् ।। ॐ अपहताऽअसुरा रक्षाʊसि वेदिषदः ।। पश्चिमपट्टी छर्ने ।                                 ॐ  उदीचिमपि सोमपाः। ॐ अपहताऽअसुरा रक्षाʊसि वेदिषदः ।।  उत्तर तिर छर्ने ।                                         ॐ  उध्र्वतस्त्वर्यमा रक्षेत् काव्यवाडनलोऽप्यध ।। माथि आकाश तीर ।                                                         ॐ सर्वतस्चाधिपस्तोषां यमो रक्षां करोतु मे । भूईमा                                                                                                                      
२३ तलकोे मन्त्र पढ्दै मोटकलाई पूmल सहित दक्षिण कट्टीमा लगेर सिउरिनेः                                         ॐ निहन्मि सर्व यदमेध्यवद्भवेद्धताश्च सर्वेऽसुरदानवा मया ।                                                                          रक्षांसि यक्षाः सपिशाचगुह्यका हता मया यातुधानाश्च सर्वे ।।
भूतोत्साधनम्
२४ तलको मन्त्र पढ्दै तीन टुक्रा कुश तिलमा चोवेर  तिल सहित दक्षिण तर्फ फालिदिनेः                        ॐ प्रायन्तु दूरतः सर्वे दैत्येया दानवास्तथा । सर्र्व्विघ्नोपशान्त्यार्थ क्षिपामि च कुशांस्तिलान् ।।
२५. सव्य भएर आचमन गर्ने र तलको मन्त्र पढ्ने र विष्णु विष्णु स्मरण गर्नेः
ॐ नमो नमस्ते गाविन्द पुराणपुरूषोतमाय । इदं श्रद्धं हृषिकेश रक्षतां सर्वतो दिशः ।।
२६. सव्यबाटै कुशका टुक्रा हातमा लिएर तलको मन्त्र पढ्दै पितृकूलका विश्वेदेव ब्राम्हणलाई कुशको आसन दिनेः                                                                                                                                            ॐ अद्येह अमुक सगोत्राणां अस्मत्पितृपितामहप्रपितामहानां अमुक अमुक शर्मणानां सपत्नीकानां वसुरूद्रआदित्यस्वरूपाणां  श्राद्धसम्बन्धिनां विश्वेषां देवानां पुरूरवो माद्रवोनाम्ना इदं कौशमासनं वः स्वाहा ।
२७. सव्यबाटै कुशका टुक्रा हातमा लिएर तलको मन्त्र पढ्दै मातृकूलका विश्वेदेव ब्राम्हणलाई कुशको आसन दिनेः                                                                                                                                            ॐ अद्येह अमुक सगोत्राणां अस्मन्मातामहप्रमातामहबृद्धप्रमातामहानांं अमुक अमुक शर्मणानां सपत्नीकानां वसुरूद्रआदित्यस्वरूपाणां  श्राद्धसम्बन्धिनां विश्वेषां देवानां पुरूरवो माद्रवोनाम्ना इदं कौशमासनं वः स्वाहा ।
२८.अपसव्य भएर मोटक हातमा लिएर तलको मन्त्र पढ्दै पितृकूलका पितृब्राम्हणलाई मोटकको आसन दिनेः                                                                                                                                             ॐ अद्येह अमुक सगोत्राणां अस्मत्पितृपितामहप्रपितामहानां अमुक अमुक शर्मणानां सपत्नीकानां वसुरूद्रआदित्यस्वरूपाणां अद्यकर्तव्य महालयपरपक्षान्तर्गत पार्वणश्राद्धे  इदं मोटकरूपमासनं त्रेधा विभज्य युष्मभ्यां स्वधा ।
२९. पुनः मोटक हातमा लिएर तलको मन्त्र पढ्दै मातृकूलका पितृब्राम्हणलाई मोटकको आसन दिनेः ॐ अद्येह अमुक सगोत्राणां अस्मन्मातामहप्रमातामहबृद्धप्रमातामहानांं अमुक अमुक शर्मणानां सपत्नीकानां वसुरूद्रआदित्यस्वरूपाणां अद्यकर्तव्य महालयपरपक्षान्तर्गत पार्वणश्राद्धे  इदं मोटकरूपमासनं त्रेधा विभज्य युष्मभ्यां स्वधा ।
विश्वेदेव ब्रम्हणलाई आव्हान
३०.  सव्य भएर अञ्जलि बाँधेर विश्जेदेव ब्राम्हणलाई आव्हान गर्नेर्ः -                                                 ॐ अद्येह अमुक सगोत्राणां अस्मत्पितृपितामहप्रपितामहानां अमुक अमुक शर्मणानां सपत्नीकानां वसुरूद्रआदित्यस्वरूपाणां तथा अमुक सगोत्राणां अस्मन्मातामहप्रमातामहबृद्धप्रमातामहानांं अमुक अमुक शर्मणानां सपत्नीकानां वसुरूद्रआदित्यस्वरूपाणां अद्यकर्तव्य महालयपरपक्षान्तर्गत पार्वणश्राद्धे  श्राद्धसम्बन्धिनो विश्वान् देवान् पुरूरवामाद्र्रव नाम्न आवाहयिष्ये । ॐ आवाहय इति प्रतिवचनम् ।।
ॐ विश्वेदेवासऽआगत श्रृणुतामऽइमǵहवम् । एदं वर्हिर्निषीदत ।। यो मन्त्रले आव्हान गर्ने ।
३०क. तलको मन्त्र पढेर श्राद्ध गर्ने स्थानमा विश्वेदेव ब्राम्हण भएतर्फ जौ छर्कने:-                                    ॐ यवाऽसि यवयास्मद्द्वेषो यवयारातीर्दिवे । त्वान्तरिक्षाय त्वा पृथिव्यै त्वा शुन्धन्तां लोकाः पितृषदन पितृषदनमसि ।।
३१. सव्यबाटै तलको मन्त्रहरु पाठ गर्नेः                                                                                                        ॐ विश्वेदेवाः श्रृणतेमǵहवम्मे योऽअन्तरिक्षे य ऽउपद्यविष्ठ । येऽअग्निजिव्हाऽउत वा यजत्राऽआसद्यास्मिन्बर्हिषिमादयध्वम् ।। ॐ आगच्छन्तु महाभागा विश्वेदेव महावलाः ये अत्र विहिताः श्राद्धे सावधाना भवन्तु ते ।।
पितृ ब्राम्हणलाई आव्हान
३२. अपसव्य भएर अञ्जलि बाँधेर तलको मन्त्र पढ्दै पितृ ब््राम्हणहरूलाई आव्हान गर्नेः                    ॐ अद्येह अमुक सगोत्राणां अस्मत्पितृपितामहप्रपितामहान् अमुक अमुक शर्मणाः सपत्नीकान् वसुरूद्रआदित्यस्वरूपान्ं तथा अमुक सगोत्रान्ं अस्मन्मातामहप्रमातामहबृद्धप्रमातामहान्ं अमुक अमुक शर्मणाः सपत्नीकान् वसुरूद्रआदित्यस्वरूपन्ं अद्यकर्तव्य महालयपरपक्षान्तर्गत पार्वणश्राद्धे  आवाहयिष्ये ।                      ॐ आवाहय इति प्रतिवचनम् ।।
३२.अपसव्य मै तलको मन्त्र पढेर पितृलाई आव्हान गर्ने र पितृ ब्राम्हण भएतर्फ तील छर्नेः
ॐ उशन्तस्त्वा निधीमह्यु शन्तः समिधीमहि । उशन्नुशतऽआवह पितृन्हविषेऽअत्तवे ।। ॐ  अपहताऽअसुरा रक्षाʊसि व्वेदिषदः ।
ॐ आयन्तु नः पितरः सोम्यासोग्निष्वात्ताः पथिभिर्देवयानैः । अस्मिन् यज्ञे स्वधया मदन्ताधि ब्रुवन्तु तेवन्त्वस्मान् ।।
हस्तार्घ
३३. सव्य भएर पश्चिम फर्केर तलको मन्त्र पढ्दै हस्तार्घ पात्र बनाउँ भनेर विश्वेदेव ब्राम्हणलाई सोध्नेः
कर्ताः- ॐ हस्तार्घपात्रमहं करिष्ये । ब्राम्हणँःॐ कुरुष्व ।
३३. दुवै (पितृकुल र मातृकुलका विश्वेदेव) ब्राम्हणको अगाडि एक एक वटा दुना राख्ने र मन्त्र पढ्दै त्यस दुनामा पवित्र, जल, पूmल, चन्दन, राख्नेः                                                                                                            पवित्र राख्ने मन्त्रः-ॐ पवित्रेस्थो व्वैष्णव्व्यौसवितुर्वः प्रसव उत्पुनाम्यछिद्रेणपवित्रेण सूर्यस्य रश्मिभिः । तस्य ते पवित्रपते पवित्रपूतस्य यत्कामः पुने तच्छकेयम् ।                                                                               जल राख्ने मन्त्रः- शन्नेदेवीरभिष्टय आपो भवन्तु पीतये । संयोरभिश्रवन्तु नः ।                                             फूल राख्ने मन्त्रः-श्रीश्च ते लक्ष्मीश्च पत्न्यावहोरात्रे पाश्र्वे नक्षत्रााणि रुपपश्विनौ व्यात्तम् । इष्णानिषाणमुम्मऽइखाण सर्वलोकम्मऽइखाण ।                                                                                  चन्दन राख्ने मन्त्रः- गन्धद्वारादुराधर्षानत्यपुष्टाङ्करीषिणीम् । ईश्वरी सर्वभूतानाम् तामिहोपव्हयेश्रियम् ।                          
३४ ब्राम्हणले मन्त्र अनुसार कर्तालाई सोध्ने अव कर्ताले हात जोडेर भन्नेः-  ?
ब्राम्हणले सोध्नेः- ॐ हस्तार्घ पात्रं सुसम्पन्नम् ? कर्ताः सुसम्पन्नम् .                                                           कर्ताः- ॐ हस्तार्घपात्रमुत्थापयामि ?  ब्राम्हणँः ॐउत्थापयस्व ।                
३५ सव्यबाटै पहिले पितृकूलका विश्वेदेवको हस्तार्घपात्रलाई देब्रे हातमा लिने र ॐ नमोः नारायण भनि दायाँ हातले पुटकपात्रमा भएको पूmल पवित्र झिकेर ब्राम्हण भएको दुनामा राखिदिने र दाहिने हात उत्तानो पारेर त्यस पुटकपात्र(दुनो)लाई ढाकिराख्ने  ब्राम्हणले मन्त्र पढ्ने :-                                       ॐ या दिव्याऽआपः पयसा सम्वभूबूर्याऽअन्तरिक्षाऽउत पार्थ्विर्याः ।                                                                  हिरण्यवर्णा यज्ञियास्ता नऽआपः शिवाः शǵस्योना सुहवा भवन्तु ।
३६ अब सव्यले नै जौ र कुश दायाँ हातमा लिने र बायाँ हातमा रहेको दुनामा रहेको पानीमा चोपेर तलको संकल्प पढ्नेः
 ॐ अद्येह अमुक सगोत्राणां अस्मत्पितृपितामहप्रपितामहानां अमुक अमुक शर्मणाः सपत्नीकानां वसुरूद्रआदित्यस्वरूपानां अद्यकर्तव्य महालयपरपक्षान्तर्गत पार्वणश्राद्धे श्राद्धसम्बन्धिनो विश्वेदेवाः पुरूरवो माद्र्रवो नामानः एष हस्तार्घो वः स्वाहा ।
अलिकति जल ब्रम्हणमा चढाइदिने र दुनो भूईमा राख्ने ।
३७ सव्यबाटै अब मातृृकूलका विश्वेदेवको हस्तार्घपात्रलाई देब्रे हातमा लिने र ॐ नमोः नारायण भनि दायाँ हातले पुटकपात्रमा भएको पूmल पवित्र झिकेर ब्राम्हण भएको दुनामा राखिदिने र दाहिने हात उत्तानो पारेर त्यस पुटकपात्र(दुनो)लाई ढाकिराख्ने  ब्राम्हणले मन्त्र पढ्ने :-                                               ॐ या दिव्याऽआपः पयसा सम्वभूबूर्याऽअन्तरिक्षाऽउत पार्थ्विर्याः ।                                                                 हिरण्यवर्णा यज्ञियास्ता नऽआपः शिवाः शǵस्योना सुहवा भवन्तु ।
३८ अब सव्यले नै जौ र कुश दायाँ हातमा लिने र बायाँ हातमा रहेको दुनामा रहेको पानीमा चोपेर तलको संकल्प पढ्नेः
 ॐ अद्येह अमुक सगोत्राणां अस्मन्मातामहप्रमातामहबृद्धप्रमातामहानां अमुक अमुक शर्मणाः सपत्नीकानां वसुरूद्रआदित्यस्वरूपानां अद्यकर्तव्य महालयपरपक्षान्तर्गत पार्वणश्राद्धे श्राद्धसम्बन्धिनो विश्वेदेवाः पुरूरवो माद्र्रवो नामानः एष हस्तार्घो वः स्वाहा ।
३९. अलिकति जल ब्रम्हणमा चढाइदिने र दुनो भूईमा राख्ने र दुवै दुनाको पानी साइली र बढी औंलाले तलको मन्त्र पढ्दै अलगअलग आफ्नो आँखामा लगाउने । पूmल, पवित्रलाई पुनः दुनामै राखेर विश्वेदेव ब्राम्हणहरूको दायाँतर्फ उत्तानो पारेर राखिदिने:-
ॐ तच्चक्षुर्देवहितं पुरस्ताच्छुक्रमुच्चरत् । पश्येम शरदः शतं जीवेम शरदः शतǵशृणुयाम शरदः शतं परब्रवाम पश्येम शरदः शतं जीवेम शरदः शतमदीना स्याम शरदः शतं भूयश्च शरदः शतात् ।।
ॐ विश्वेभ्यो देवेभ्यो स्थानमसिँदुई पटक पढ्ने ।
४०. अपसव्य भएर पितृ ब्राम्हणलाई सोध्नेः-
कर्ताः ॐ हस्तार्घपात्रमहं करिष्ये । ब्राम्हणँःॐ कुरुष्व ।
४१.पितृकुल र मातृ कुलका दुइवटै पितृ ब्राम्हणको अगाडि तीन तीनवटा दुनाहरू राख्ने र तलको मन्त्रहरू पढ्दै क्रमशः सबैमा मन्त्रमा भनिए अनुसारका सामग्रीहरू राख्ने:-
पवित्र राख्ने मन्त्रः-ॐ पवित्रेस्थो व्वैष्णव्व्यौसवितुर्वः प्रसव उत्पुनाम्यछिद्रेणपवित्रेण सूर्यस्य रश्मिभिः । तस्य ते पवित्रपते पवित्रपूतस्य यत्कामः पुने तच्छकेयम् ।                                                                               जल राख्ने मन्त्रः- शन्नेदेवीरभिष्टय आपो भवन्तु पीतये । संयोरभिश्रवन्तु नः ।                                             फूल राख्ने मन्त्रः-श्रीश्च ते लक्ष्मीश्च पत्न्यावहोरात्रे पाश्र्वे नक्षत्रााणि रुपपश्विनौ व्यात्तम् । इष्णानिषाणमुम्मऽइखाण सर्वलोकम्मऽइखाण ।                                                                                 चन्दन राख्ने मन्त्रः- गन्धद्वारादुराधर्षानत्यपुष्टाङ्करीषिणीम् । ईश्वरी सर्वभूतानाम् तामिहोपव्हयेश्रियम् ।                                           
४२. ब्राम्हणले मन्त्र अनुसार कर्तालाई सोध्ने अव कर्ताले हात जोडेर भन्नेः-
ब्राम्हणले सोध्नेःँॐ हस्तार्घ पात्राणि सुसम्पन्नानि ? कर्ताः सुसम्पन्नामनि । .                                               कर्ताः ॐ हस्तार्घपात्रमुत्थापयामि ?  ब्राम्हणँः ॐउत्थापयस्व ।  
४३. पितृकुलका पितृ ब्राम्हणको १ नं.( पिताको) को दुनो बायाँ हातमा लिने र ॐ नमो नारायण भनि त्यसमा भएको पूmल पवित्र ब्रम्हणमा राखिदिने र दायाँ हातले उत्तानो पारी दुनोलाई ढाकी तलको मन्त्र पढ्नेः        
ॐ या दिव्याऽआपः पयसा सम्वभूबूर्याऽअन्तरिक्षाऽउत पार्थ्विर्याः ।                                                               हिरण्यवर्णा यज्ञियास्ता नऽआपः शिवाः शǵस्योना सुहवा भवन्तु ।
४४. अब तील, जल र मोटक दुनो दायाँ हातमा लिएर तलको मन्त्र पढ्ने:-
ॐ अद्येह अमुक सगोत्रों अस्मत्पितर अमुक शर्मन् सपत्नीक वसुस्वरूपां अद्यकर्तव्य महालयपरपक्षान्तर्गत पार्वणश्राद्धे एष हस्तार्घस्ते स्वधाँमोटक ब्रम्हणमा राखिदिने र अलिकति जल चढाइदिने र ब्रम्हणमा चढाएको पूmल पवित्र झिकेर सोही दुनोमा राखेर दुनो पूर्ववत् ठाउँमा राखिदिने ।
४५. पितृकुलका पितृ ब्राम्हणको २ नं.( पितामहको) को दुनो बायाँ हातमा लिने र ॐ नमो नारायण भनि त्यसमा भएको पूmल पवित्र ब्रम्हणमा राखिदिने र दायाँ हातले उत्तानो पारी दुनोलाई ढाकी तलको मन्त्र पढ्नेः -
ॐ या दिव्याऽआपः पयसा सम्वभूबूर्याऽअन्तरिक्षाऽउत पार्थ्विर्याः ।                                                                   हिरण्यवर्णा यज्ञियास्ता नऽआपः शिवाः शǵस्योना सुहवा भवन्तु ।
४६. अब तील, जल र मोटक दुनो दायाँ हातमा लिएर तलको मन्त्र पढ्नेँ:-
ॐ अद्येह अमुक सगोत्रों अस्मत्पितामह अमुक शर्मन् सपत्नीक रूद्रस्वरूपां अद्यकर्तव्य महालयपरपक्षान्तर्गत पार्वणश्राद्धे एष हस्तार्घस्ते स्वधाँमोटक ब्रम्हणमा राखिदिने र अलिकति जल चढाइदिने र ब्रम्हणमा चढाएको पूmल पवित्र झिकेर सोही दुनोमा राखेर दुनो पूर्ववत् ठाउँमा राखिदिने ।
४७. पितृकुलका पितृ ब्राम्हणको ३ नं.(प्रपितामहको) को दुनो बायाँ हातमा लिने र ॐ नमो नारायण भनि त्यसमा भएको पूmल पवित्र ब्रम्हणमा राखिदिने र दायाँ हातले उत्तानो पारी दुनोलाई ढाकी तलको मन्त्र पढ्नेः-        
ॐ या दिव्याऽआपः पयसा सम्वभूबूर्याऽअन्तरिक्षाऽउत पार्थ्विर्याः ।                                                                 हिरण्यवर्णा यज्ञियास्ता नऽआपः शिवाः शǵस्योना सुहवा भवन्तु ।
४८. अब तील, जल र मोटक दुनो दायाँ हातमा लिएर तलको मन्त्र पढ्ने:-
ॐ अद्येह अमुक सगोत्रों अस्मत्प्रपितामह अमुक शर्मन् सपत्नीक आदित्यस्वरूपां अद्यकर्तव्य महालयपरपक्षान्तर्गत पार्वणश्राद्धे एष हस्तार्घस्ते स्वधाँमोटक ब्रम्हणमा राखिदिने र अलिकति जल चढाइदिने र ब्रम्हणमा चढाएको पूmल पवित्र झिकेर सोही दुनोमा राखेर दुनो पूर्ववत् ठाउँमा राखिदिने ।
४९.मातृकुलका पितृ ब्राम्हणको १ नं.( मातामहको) को दुनो बायाँ हातमा लिने र ॐ नमो नारायण भनि त्यसमा भएको पूmल पवित्र ब्रम्हणमा राखिदिने र दायाँ हातले उत्तानो पारी दुनोलाई ढाकी तलको मन्त्र पढ्नेः -       
ॐ या दिव्याऽआपः पयसा सम्वभूबूर्याऽअन्तरिक्षाऽउत पार्थ्विर्याः ।                                                                हिरण्यवर्णा यज्ञियास्ता नऽआपः शिवाः शǵस्योना सुहवा भवन्तु ।
५०. अब तील, जल र मोटक दुनो दायाँ हातमा लिएर तलको मन्त्र पढ्ने:-
ॐ अद्येह अमुक सगोत्रों अस्मत्मातामह अमुक शर्मन् सपत्नीक वसुस्वरूपा अद्यकर्तव्य महालयपरपक्षान्तर्गत पार्वणश्राद्धे एष हस्तार्घस्ते स्वधाँमोटक ब्रम्हणमा राखिदिने र अलिकति जल चढाइदिने ब्रम्हणमा चढाएको पूmल पवित्र झिकेर सोही दुनोमा राखेर दुनो पूर्ववत् ठाउँमा राखिदिने ।
५१.मातृकुलका पितृ ब्राम्हणको २ नं.( प्रमातामहको) को दुनो बायाँ हातमा लिने र ॐ नमो नारायण भनि त्यसमा भएको पूmल पवित्र ब्रम्हणमा राखिदिने र दायाँ हातले उत्तानो पारी दुनोलाई ढाकी तलको मन्त्र पढ्नेः -       
ॐ या दिव्याऽआपः पयसा सम्वभूबूर्याऽअन्तरिक्षाऽउत पार्थ्विर्याः ।                                                                                हिरण्यवर्णा यज्ञियास्ता नऽआपः शिवाः शǵस्योना सुहवा भवन्तु ।
५२. अब तील, जल र मोटक दुनो दायाँ हातमा लिएर तलको मन्त्र पढ्ने:-
ॐ अद्येह अमुक सगोत्रों अस्मत्प्रमातामह अमुक शर्मन् सपत्नीक रूद्रस्वरूपां अद्यकर्तव्य महालयपरपक्षान्तर्गत पार्वणश्राद्धे एष हस्तार्घस्ते स्वधाँमोटक ब्रम्हणमा राखिदिने र अलिकति जल चढाइदिने, ब्रम्हणमा चढाएको पूmल पवित्र झिकेर सोही दुनोमा राखेर दुनो पूर्ववत् ठाउँमा राखिदिने ।
५३.मातृृकुलका पितृ ब्राम्हणको ३ नं.( बृद्धप्रमातामह ) को दुनो बायाँ हातमा लिने र ॐ नमो नारायण भनि त्यसमा भएको पूmल पवित्र ब्रम्हणमा राखिदिने र दायाँ हातले उत्तानो पारी दुनोलाई ढाकी तलको मन्त्र पढ्नेः -       
ॐ या दिव्याऽआपः पयसा सम्वभूबूर्याऽअन्तरिक्षाऽउत पार्थ्विर्याः ।                                                                हिरण्यवर्णा यज्ञियास्ता नऽआपः शिवाः शǵस्योना सुहवा भवन्तु ।
५४. अब तील, जल र मोटक दुनो दायाँ हातमा लिएर तलको मन्त्र पढ्ने:-
ॐ अद्येह अमुक सगोत्रों अस्मत्बृद्धप्रमातामह अमुक शर्मन् सपत्नीक आदित्युस्वरूपां अद्यकर्तव्य महालयपरपक्षान्तर्गत पार्वणश्राद्धे एष हस्तार्घस्ते स्वधाँमोटक ब्रम्हणमा राखिदिने र अलिकति जल चढाइदिने र ब्रम्हणमा चढाएको पूmल पवित्र झिकेर सोही दुनोमा राखेर दुनो पूर्ववत् ठाउँमा राखिदिने ।
५५.अब पितृकुलका पितृ ब्राम्हणको अगाडि राखिएका तीनवटा दुनाहरूमध्ये ३ नं को दुनाको पानी २ नं. दुनामा र २ नं. बाट १ नं. मा खन्याउने र ३ नं. को दुनो तल राख्ने, बीचमा २ नं. को र १ नं. को ल सहितको दुनो सबैभन्दा माथि राख्ने । त्यसैगरी मातृकुलका पितृ ब्राम्हणको दुनोहरू पनि त्यसै गरी १ नं को माथि पारेर खापेर राख्ने ।
त्यसपछि सव्य भएर आचमन गर्ने र तलको मन्त्र पढेर दुवै दुनाको पानी साइली र बुढी औंलाले आफ्नो आँखामा लगाउनेः:-
ॐ तच्चक्षुर्देवहितं पुरस्ताच्छुक्रमुच्चरत् । पश्येम शरदः शतं जीवेम शरदः शतǵशृणुयाम शरदः शतं परब्रवाम पश्येम शरदः शतं जीवेम शरदः शतमदीना स्याम शरदः शतं भूयश्च शरदः शतात् ।।
५६.अब अपसव्य भएर पितृकुल र मातृ कुलका पितृब्राम्हणहरूको अगाडि रहेका दुनाहरूको समूहलाई तलको मन्त्र पढ्दै ब्राम्हणको वायाँतर्फ घोप्ट्याइदिने ।
ॐ पितृभ्यः स्थानमसि । ॐ मातामहेभ्यः स्थानमसि ।
५७. सव्य भएर विश्वेदेव ब्राम्हणलाई सोध्नेँ:-
कर्ता ॐ अर्चयिष्ये ? ब्राम्हण ॐ अर्चये ।
५८. चन्दन, पूmल, अक्षताले विश्वेदेव ब्राम्हणलाई पुजा गर्ने र जनै, वस्त्र, दक्षिणा, धुप, दीप, नैवेद्य चढाइदिने र जल अर्पण गर्ने:-
५९. सव्यमा नै पितृकुलका विश्वेदेव ब्रम्हण तर्फ फर्किएर कुशपानी हातमा लिएर तलको संकल्प पढ्नेः-
ॐ अद्येह अमुक सगोत्राणां अस्मत्पितृपितामहप्रपितामहानां अमुक अमुक शर्मणानां सपत्नीकानां वसुरूद्रआदित्यस्वरूपाणां अद्यकर्तव्य महालयपरपक्षान्तर्गत पार्वण श्राद्धे श्राद्धसम्बन्धिनो ंविश्वेदेवाः पुरुरवो माद्र्रवो नामानः एतान्य अर्चनानि अत्रगन्धपुष्पक्षत, धूपदीपनैवेद्य, ताम्बूल, यज्ञोपवित द्रव्यवासांसि वः स्वहा ।
६०. अब अर्का मातृकुलका विश्वेदेव ब्राम्हण तर्फ फर्किएर कुशपानी हातमा लिएर तलको संकल्प पढ्नेः-
अद्येह अमुक सगोत्राणां अस्मन्मातामहप्रमातामहबृद्धप्रमातामहानां अमुक अमुक शर्मणानां सपत्नीकानां वसुरूद्रआदित्यस्वरूपाणां अद्यकर्तव्य महालयपरपक्षान्तर्गत पार्वण श्राद्धे श्राद्धसम्बन्धिनो ंविश्वेदेवाः पुरुरवो माद्र्रवो नामानः एतान्य अर्चनानि अत्रगन्धपुष्पक्षत, धूपदीपनैवेद्य, ताम्बूल, यज्ञोपवित द्रव्यवासांसि वः स्वहा ।
६१. अपसव्य भएर पितृकुल र मातृकुलका पितृ ब्राम्हणलाई सोध्नेँ  :-                                                         कर्ता ॐ अर्चयिष्ये ? ब्राम्हण ॐ अर्चये ।
६२. अपसव्यबाटै चन्दन, पूmल, अक्षताले पितृकुलका पितृ ब्राम्हणलाई पुजा गर्ने र जनै, वस्त्र, दक्षिणा, धुप, दीप, नैवेद्य चढाइदिने र जल अर्पण गर्ने:-
६३.अपसव्यबाटै पितृकुलका पितृ ब्राम्हणतर्फ फर्किएर कमोटक पानी हातमा लिएर तलको संकल्प पढ्नेः-
ॐ अद्येह अमुक सगोत्रा अस्मत्पितृपितामहप्रपितामहाःं अमुक अमुक शर्माणःसपत्नीका वसुरूद्रआदित्यस्वरूपा अद्यकर्तव्य महालयपरपक्षान्तर्गत पार्वण श्राद्धे एतान्य अर्चनान्य अत्रः अत्रगन्धपुष्पक्षत, धूपदीपनैवेद्य, ताम्बूल, यज्ञोपवित द्रव्यवासांसि त्रेधा विभज्य युष्मभ्यं स्वधा ।
६४. अपसव्यबाटै चन्दन, पूmल, अक्षताले मातृकुलका पितृ ब्राम्हणलाई पुजा गर्ने र जनै, वस्त्र, दक्षिणा, धुप, दीप, नैवेद्य चढाइदिने र जल अर्पण गर्ने:-
६५. अपसव्यबाटै अर्का मातृकुलका पितृ ब्राम्हण तर्फ फर्किएर कुशपानी हातमा लिएर तलको संकल्प पढ्नेः
अद्येह अमुक सगोत्रा अस्मन्मातामहप्रमातामहबृद्धप्रमातामहाः अमुक अमुक शर्माणः सपत्नीका वसुरूद्रआदित्यस्वरूपा अद्यकर्तव्य महालयपरपक्षान्तर्गत पार्वण श्राद्धे एतान्य अर्चनान्य अत्रः अत्रगन्धपुष्पक्षत, धूपदीपनैवेद्य, ताम्बूल, यज्ञोपवित द्रव्यवासांसि त्रेधा विभज्य युष्मभ्यं स्वधा ।
६६. सव्य भएर विश्वेदेव ब्राम्हण तर्फ फर्किएर तलको बचन उच्चारण गर्दै जल सेचन गरिदिने:-             कर्ता:- ॐ अर्चनविधेः सर्व परिपूर्णमस्तु । ब्राम्हणहरू ॐँअस्तु ।                                                          ६७. अपसव्य भएर पितृ ब्राम्हण तर्फ फर्किएर तलको बचन उच्चारण गर्दै जल सेचन गरिदिने :-         कर्ता :- ॐ अर्चनविधेः सर्व परिपूर्णमस्तु । ब्राम्हणहरू ॐँअस्तु ।
. मण्डलकरणम्
६८ सव्य भएर आचमन गर्ने र तलको मन्त्र पढ्दै देवब्राम्हणको भोजनका लागि जल र खरानीले छेकेर चारकुने मण्डल निर्माण गर्नेः -                                                                                                   .ॐ यथा चक्रायुधो बिष्णुस्त्रैलोक्यं परिरक्षति । एवं मण्डलभस्मैतत्सर्वभूतानि रक्षतु ।।
६९.अपसव्य भएर तलको मन्त्र पढ्दै पितृब्राम्हणको भोजनका लागि जल र खरानीले छेकेर चारकुने मण्डल निर्माण गर्नेः -                                                                                                                           .ॐ यथा चक्रायुधो बिष्णुस्त्रैलोक्यं परिरक्षति । एवं मण्डलभस्मैतत्सर्वभूतानि रक्षतु ।।
अग्नौकरण
७०. अपसव्य भएर दुबै पितृब्रम्हणको अगाडि १।१ वटा दुनामा जल राख्ने र एउटा दुनामा घीउमा मुछेको चामल तयार पार्ने र दक्षिण फर्किएर वायाँ घुँडा तेस्र्याएर तलको मन्त्रद्वारा ब्रम्हणलाई सोध्नेः-   कर्ताँ.ॐअग्नौकरणमहं करिष्ये ।  ब्राम्हणँ.ॐ कुरूस्व ।
७१. घिउमा मुछिएको चामल पितृ ब्रम्हणहरूको अगाडि राखिएको दुनाको जलमा पर्ने गरी तलको मन्त्र पढ्दै कुशद्वारा २।२ पटक होम गर्ने (दुनामा खसालि दिने)
.ॐ अग्नये काव्यवाहनायस्वाहा, इदमग्नये काव्यवहनाय । ॐ सोमाय पितृमते स्वाहा, इदं सोमाय पितृमते ।।
७२. सव्य भएर होम गरेर बाँकी रहेको शेषान्न अलिकति विश्वेदेव ब्रम्हणमा खसालि दिने र पुन अपसब्य भएर बाकी रहेको अन्न पितृ ब्रम्हणकोमा खसालि दिने ।
भूस्वामी
७३. अपसव्यबाटै एउटा दुनामा तिल, जल, मह, घिउ सहित एउटा सिदामाथि राख्ने र मोटकपानी लिएर तलको मन्त्र पढेर भूस्वामि अर्पण गरिदिनेः                                                                                 ॐ इदमन्नं सजलसघृतसमधुमेतद् भूस्वामिपितृभ्यो नमः -                                                                         अन्नसङ्कल्पः- देवब्राम्हण अन्नदानम्                                                                                                         ७४. अब सव्य हुने र ब्रम्हण भोजनको लागि दुईवटै विश्वेदेव ब्रम्हणको अगाडि १।१ भाग सिदा राखि त्यसमाथि जल, जौ, मह, अन्न सहितको सिदा त्यस चौकोण मण्डल माथि राखेर दक्षिणतर्फ फर्किएर सिदाको पात्रलाई हातले ढाकेर प्रत्येक सिदाको लागि १।१ पटक तलको मन्त्र पढ्नेः               ॐ पृथिवि ते पात्रं द्योरपिधानं ब्रम्हणस्य मुखेऽअमृतेऽअमृतं जुहामि स्वाहा । ॐ इदं विष्णुविचक्रमे त्रेधानिदधे पदम् । समूढमस्यपाʊसुरे स्वाहा । ॐ विष्णवे नमः । कष्ण कव्यमिदं रक्ष मदीयम् ।                                                                              
७५.  दयाँ हातको बुढि औंलाले देखाउदै मन्त्र पढेर जल, घीउ, अन्नलाई देखाउदै पालैपालो २।२ भन्नेः-    ॐ इदंमन्नं, ॐ इमा आपः, इदमाज्यम्, ॐ इदं हविः ।                                                                               ७६.तलको मन्त्र पढ्दै दायाँबाट सिदामा वरिपरि जौ छर्कनेः -                                                     
ॐ यवोऽसि यवयास्मद्देषो यवयारातीर्दिवे त्वान्तरिक्षाय त्वा पृथीव्यै त्वासुन्धन्तां लोकाः पितृषदना पितृषदनमसि ।
७६. पितृकुलका विश्वेदेवको अगाडि एउटा दुनामा पानी राख्ने, बायाँ हातको औंलाले दुनाको पानी र बुढी औंलाले अन्नमा छुने र दायाँ हातले कुश, जौ र पानी लिने र तलको संकल्प पढ्नेः-
ॐ अद्येह अमुक सगोत्राणां अस्मत्पितृपितामहप्रपितामहानां अमुक अमुक शर्मणानां सपत्नीकानां वसुरूद्रआदित्यस्वरूपाणां श्रद्धसम्बन्धिभ्यो विश्वेभ्यो देवेभ्यः पुरूरवोमाद्र्रवो नामभ्यः अद्यकर्तव्य महालयपरपक्षान्तर्गत पार्वणश्राद्धे इदमन्नं सजलं सोपस्करं परिविष्टं परिवेक्षमाणमक्ष्यतृप्तिहेतोर्वः स्वाहा ।
७७. मातृकुलका विश्वेदेवको अगाडि एउटा दुनामा पानी राख्ने, बायाँ हातको औंलाले दुनाको पानी र बुढी औंलाले अन्नमा छुने र दायाँ हातले कुश, जौ र पानी लिने र तलको संकल्प पढ्नेः-
ॐ अद्येह अमुक सगोत्राणां अस्मन्मातामहप्रमातामहबृद्धप्रमातामहानां अमुक अमुक शर्मणानां सपत्नीकानां वसुरूद्रआदित्यस्वरूपाणां श्रद्धसम्बन्धिभ्यो विश्वेभ्यो देवेभ्यः पुरूरवोमाद्र्रवो नामभ्यः अद्यकर्तव्य महालयपरपक्षान्तर्गत पार्वणश्राद्धे इदमन्नं सजलं सोपस्करं परिविष्टं परिवेक्षमाणमं अक्षयतृप्तिहेतोर्वः स्वाहा ।
पितृअन्नदानम्
७८. अपसव्य भई पहिलो पितृकुलका पितृ ब्रम्हणको अगाडि एउटा सिदा(भोजन पात्र) राखि एउउटा दुनामा तिल, घिउ, मह र जल समेत राखि मह छर्किने दुवै हातले घोप्टो पारेर राख्दै तलको मन्त्र पढ्नेः-
ॐ पृथिवी ते पात्रम् द्योरपिधानम् ब्राम्हणस्य मुखे ऽअमृतेऽअमृतं जुहामि स्वा ।
७९. दोस्रो मातृकुलका पितृब्राम्हणको अगाडि एउटा सिदा(भोजन पात्र) राखि एउउटा दुनामा तिल, मह र जल समेत राखि दुवै हातले घोप्टो पारेर राख्दै तलको मन्त्र पढ्नेः-
ॐ पृथिवी ते पात्रम् द्योरपिधानम् ब्राम्हणस्य मुखे ऽअमृतेऽअमृतं जुहामि स्वा ।
८०. पहिलो पितृकुलका पितृ ब्रम्हणको अगाडिको सिदा (भोजनपात्र) मा भएका खानेकुराहरूलाई दाहिने हातको बुढी औलाले देखाउदै तलको मन्त्र पढ्नेः-
ॐ इदंमन्नम्, ॐ इमा आपः, ॐ इदमाज्यम्, ॐ इदं हविः ।
८१. तलको मन्त्र पढ्दै दुवै सिदा (अन्नपात्र) मा बायाँ तर्फबाट तिल छर्कने:-
ॐ अपहता असुरारक्षाʊसिव्वेदिषदः ।
८२. दोस्रो मातृकुलका पितृ ब्रम्हणको अगाडिको सिदा (भोजनपात्र) मा भएका खानेकुराहरूलाई दाहिने हातको बुढी औलाले देखाउदै तलको मन्त्र पढ्नेः-
ॐ इदंमन्नम्, ॐ इमा आपः, ॐ इदमाज्यम्, ॐ इदं हविः, ।
८३. पहिलो पितृकुलका पितृ ब्रम्हणको अगाडिको सिदा (भोजनपात्र) को अगाडि एउटा दुनामा पानी राख्ने र बायाँ हातका औलाले दुनाको पानीमा र बुढीऔंलालले सिदाको अन्नमा छुने र दायाँ हातमा मोटक पानी लिएर तलको अन्न सङ्कल्प पढ्नेः-
ॐ अद्येह अमुक सगोत्राय अस्मत्पित्र, पितामहाय, प्रपितामहाय अमुक अमुक शर्मणे सपत्नीकाय वसुरूद्रआदित्य स्वरुपाय अद्यकर्तव्य महालयपरपक्षान्तर्गत पार्वणश्राद्धे इदमन्नं सजलं सोपस्करं परिविष्टं परिवेक्षमाणमं अक्षय तृप्तिहेतोस्ते स्वधा ।
८४. दोस्रो मातृृकुलका पितृ ब्रम्हणको अगाडिको सिदा (भोजनपात्र) को अगाडि एउटा दुनामा पानी राख्ने र बायाँ हातका औलाले दुनाको पानीमा र बुढीऔंलालले सिदाको अन्नमा छुने र दायाँ हातमा मोटक पानी लिएर तलको अन्न सङ्कल्प पढ्नेः
ॐ अद्येह अमुक सगोत्राय अस्मन्मातामहाय, प्रमातामहाय, बृद्धप्रमातामहाय अमुक अमुक शर्मणे सपत्नीकाय वसुरूद्रआदित्य स्वरूपाय अद्यकर्तव्य महालयपरपक्षान्तर्गत पार्वणश्राद्धे इदमन्नं सजलं सोपस्करं परिविष्टं परिवेक्षमाणमं अक्षय तृप्तिहेतोस्ते स्वधा ।
८५. कर्म गराउने ब्राम्हणहरूलाई पनि केही हल्का चमेना  वा फलपूmल भोजन गराउने :-                                                                                                                                                       
८६. सव्य भएर आचमन गर्ने र पश्चिमतर्फ फर्किइ विश्वेदेव ब्राम्हणलाई जल चढाउदै तलको मन्त्र पढ्नेः  ॐ भवन्तौ प्राशयेताम् ।
८७. अपसव्य भएर दक्षिणतर्फ पितृब्राम्हणलाई जल चढाउदै तलको मन्त्र पढ्नेः-
ॐ भवन्तः प्राशयन्तु ।
८८. सव्य भइ कुशको आसनमा बसेर तलको मन्त्र पढ्दै जानेः-
ॐ मधुव्वाताऽऋतायते मधुक्षरन्ति सिन्धवः । माध्वीर्नः सन्त्योषधिः।। ॐमधुनक्त मुतोषसोमधुमत्पार्थिव ǵरजः । मधुद्यौरस्तु नः पितारमाता ।। ॐमधुमान्नो वनस्पतिर्मधुमाँ अस्तु सूर्यः । माध्वीर्गावोभवन्तुनः ॐ मधु ॐ मधु ॐ मधु ।
ॐ अन्नहीनं क्रियाहीनं विधिहीनं च यद्भवेत् तत् सर्वमच्छिद्रमस्तु भाष्करस्य प्रसादतः ।।                                 ॐ नमस्तुभ्यं विरूपाक्ष् नमस्ते नेकचक्षुष्े । नमः पिनाकहस्ताय वज्रहस्ताय वै नमः ।।  
८९. अब ब्राम्हणहरूलाई सुखसंग खुशीले भोजन गर्नुहोस् भन्ने कामना गर्दै .सव्य भई आचमन गरेर गायत्री जप गरेर तलका मन्त्रहरू पढ्नेः-
ॐ मधुव्वाताऽऋतायते मधुक्षरन्ति सिन्धवः । माध्वीर्नः सन्त्योषधिः।।  ॐ मधुनक्त मुतोषसोमधुमत्पार्थिव ǵरजः । मधुद्यौरस्तु नः पितारमाता ।। ॐमधुमान्नो वनस्पतिर्मधुमाँ अस्तु सूर्यः । माध्वीर्गावोभवन्तुनः      ॐ मधु ॐ मधु ॐ मधु ।
ॐ यथासुखं जुषध्वम् ।
९०.सम्भव  भएसम्म अन्नसङ्कल्प पछि पितृसुक्तका  निम्न मन्त्रहरु पाठ गर्नु पर्छः -                     हरि ॐअग्नयेकाव्यवाहनायेति ६ श्लोक, ॐ तदेवाग्नि १६ श्लोक, ॐ कृणुष्व पाज इति ५ श्लोक, ॐ  सुरावन्तमित्यादि ४० श्लोक, ॐ सहस्रशिर्षेति १६ श्लोक र रुद्रीको पाँचौ अध्याय ॐ नमस्ते इति ६६ श्लोक सहित जम्मा १४९ श्लोक पाठ गर्न उपयुक्त हुन्छ । त्यस पछि सके रामगिता (रामायण उत्तरकाण्डका श्लोकहरु )
विकिरासनम्
९१. सव्यमा नै विकिर आसनको लागि नैऋत्य दिशामा दक्षिणट्टिी टुप्पो फर्काएर तलको मन्त्र पढ्दै ३ वटा कुशका टुकाहरू राख्नेः-
मन्त्रः असंस्कृतप्रमीतानां त्यागिनां कुलयोषिताम् । उच्ष्टिभागधेयानां दर्भेषु विकिरासनम् ।                            
विकिर दान
९२. अपसव्य भै दायाँ हातमा एउउटा दुनामा तिल, घीउ र मह मिसिएको अन्न मोटकपानी लिने र बायाँ हातमा एउटा दुनामा पानी लिने र तलको मन्त्र पढ्दै उक्त विकिरलाई कुशको आसन दिएको स्थानमा घोप्ट्याइदिने, औंठी फुकालेर त्यहिं राखिदिने:-                                                   अग्निदग्धाश्च ये जीवा येऽप्यदग्धाः कुले मम । भूमौ दत्तेन तृप्यन्तु तृप्ता यान्तु परां गतिम् ।।
९३.सव्य भइ हातगोडा धुने र ६ पटक आचमन गर्ने र गायत्री जप गर्ने अनि तलको मन्त्र पढ्नेः-
मन्त्रःँ ॐ मधुव्वाताऽऋतायते मधुक्षरन्ति सिन्धवः । माध्वीर्नः सन्त्योषधिः।।                                                ॐमधुनक्त मुतोषसोमधुमत्पार्थिव ǵरजः । मधुद्यौरस्तु नः पितारमाता ।।  
९४. सव्यबाटै विश्वेदेव ब्राम्हणहरू अघाए भन्ने ठानेर  तलको मन्त्र पढेर चुठ्नलाई जल चढाइ दिने र हात जोडी वार्ता गर्ने :-
मन्त्रः ॐ  जलगण्डूषमिदं ते ।                                                                                                                       कार्ता- ॐ तृप्यास्थ ?,  ब्राम्हण - ॐ तृप्तास्म, कर्ताँ ॐ शेषंमन्नं किं क्रियताम्,  ब्राम्हण-ॐ  इष्टैः सह भूज्यताम् ,  कर्ताँ -ॐ पिण्डदानमहं करिष्ये । ब्रम्हणँ- ॐ  कुरुष्व ।                                                           ९५.  अपसव्य भएर पितृ ब्राम्हणहरू अघाए भन्ने ठानेर  तलको मन्त्र पढेर चुठ्नलाई जल चढाइ दिने र हात जोडी वार्ता गर्न:-
मन्त्रः ॐ  जलगण्डूषमिदं ते ।                                                                                    कार्ता ँ ॐ तृप्यास्थ ?,  ब्राम्हण - ॐ तृप्तास्म, कर्ताँ -ॐ शेषंमन्नं किं क्रियताम्,  ब्राम्हण - ॐ  इष्टैः सह भूज्यताम्, कर्ताँ-  ॐ पिण्डदानमहं करिष्ये । ब्रम्हणँ ॐ  कुरुष्व ।
 पिण्डबेदि निर्माण तथा संस्कारः-
९६. अपसव्यले नै  दक्षिण तर्फ पानीढोलो भएको पिण्डवेदी बालुवाबाटतयार गर्ने  र कुशका ३ वटा लामा टुक्राहरु बायाँ हातमा लिने र मन्त्रपढ्दै दायाँ हातले बेदीमा दक्षिणबाट दुइवटा रेखा कोर्दै उत्तरतर्फ ल्याउने र कुश रेखामाथि उत्तरतर्फ फर्काएर राख्नेः -                                                                     ॐ अपहताऽसुरा रक्षाʊसि वेदिषदः ।                                                                                                             ९७. तलकोे मन्त्रपढ्दै आगाका कोइला पिण्डबेदी माथि घुमाएर दक्षिणतर्फ खसालिदिनेः -                    ॐ ये रुपाणि प्रतिमुञ्चमानाऽअसुराः सन्तः स्वधया चरन्ति ।                                                                        परापुरो निपुरो ये भरन्त्यग्निष्ठाँलोकान् प्रणुदात्यस्मात् ।।
९८. तलकोे मन्त्रपढ्दै बेदीमा जल छर्कने र टुप्पो दक्षिण पारेर जरा नभएको कुश बेदीमा ओछ्याउनेः-                                                                                                                                                             शन्नेदेवीरभिष्टय आपो भवन्तु पीतये । संयोरभिश्रवन्तु नः ।                                                                           ९९. सव्य भएर तलको मन्त्र तीनपटक पढ्ने ।                                                                                          ॐ देवताभ्यः- पितृभ्यश्च महायोगिभ्य एव च । नमः स्वाहायै स्वधायै नित्यमेव नमोनमः ।। ३
अवनेजनम्:-                                                                                                                                              १००. अपसव्य भएर बायाँ हातमा दुनामा पानी र दायाँ हातमा मोटक पानी लिने ब्राम्हणले नं. तलको संकल्प पढ्ने । संकल्प पढिसकेपछि मोटकलाई पिण्डदिने स्थान दायाँतर्फ सबैभन्दा दक्षिणमा राखि दुनाको जल चढाईदिनेः –(कुन मोटक कुन पितृको नाममा राखिएको हो सो कुरा कर्ताले संझिनु पर्दछ )
ॐ अद्येह अमुक सगोत्रं अस्मत्पितर अमुक शर्मन् सपत्नीक वसुस्वरूप अद्यकर्तव्य महालयपरपक्षान्तर्गत पार्वणश्राद्धे पिण्डस्थानेऽत्रावन्यजने निक्ष्व ते स्वधा ।
१०१. पुन पितामहको लागि अर्को दुनामा जल र दायाँ हातमा मोटक पानी लिएर तलको संकल्प पढेर २ नंम्बरमा पिताको भन्दा पछाडि मोटक राखिदिनेः-
ॐ अद्येह अमुक सगोत्रं अस्मत्पितामह अमुक शर्मन् सपत्नीक रूद्रस्वरूप अद्यकर्तव्य महालयपरपक्षान्तर्गत पार्वणश्राद्धे पिण्डस्थानेऽत्रावन्यजने निक्ष्व ते स्वधा ।
१०२. पुन प्रपितामहको लागि अर्को दुनामा जल र दायाँ हातमा मोटक पानी लिएर तलको संकल्प पढेर ३ नंम्बरमा पितामहको भन्दा पछाडि मोटक राखिदिनेः-
ॐ अद्येह अमुक सगोत्रं अस्मत्प्रपितामह अमुक शर्मन् सपत्नीक आदित्यस्वरूप अद्यकर्तव्य महालयपरपक्षान्तर्गत पार्वणश्राद्धे पिण्डस्थानेऽत्रावन्यजने निक्ष्व ते स्वधा ।
१०३. पुन मातामहको लागि अर्को दुनामा जल र दायाँ हातमा मोटक पानी लिएर तलको संकल्प पढेर  बायाँतर्फ अर्को लाइन बनाएर १ नंम्बरमा सबैभन्दा छेउमा मोटक राखिदिनेः-
ॐ अद्येह अमुक सगोत्रं मातामह अमुक शर्मन् सपत्नीक वसुस्वरूप अद्यकर्तव्य महालयपरपक्षान्तर्गत पार्वणश्राद्धे पिण्डस्थानेऽत्रावन्यजने निक्ष्व ते स्वधा .
१०४. पुन प्रमातामहको लागि अर्को दुनामा जल र दायाँ हातमा मोटक पानी लिएर तलको संकल्प पढेर बायाँतर्फ अर्को लाइन बनाएर २ नंम्बरमा मोटक राखिदिनेः-
ॐ अद्येह अमुक सगोत्रं प्रमातामह अमुक शर्मन् सपत्नीक रूद्रस्वरूप अद्यकर्तव्य महालयपरपक्षान्तर्गत पार्वणश्राद्धे पिण्डस्थानेऽत्रावन्यजने निक्ष्व ते स्वधा ।
१०५. पुन बद्धप्रमातामहको लागि अर्को दुनामा जल र दायाँ हातमा मोटक पानी लिएर तलको संकल्प पढेर बायाँतर्फ अर्को लाइन बनाएर ३ नंम्बरमा मोटक राखिदिनेः-
ॐ अद्येह अमुक सगोत्रं बृद्धप्रमातामह अमुक शर्मन् सपत्नीक आदित्यस्वरूप अद्यकर्तव्य महालयपरपक्षान्तर्गत पार्वणश्राद्धे पिण्डस्थानेऽत्रावन्यजने निक्ष्व ते स्वधा ।
१०६. अपसव्यबाटै पायसमा गाईको दुध, दही, घीउ, मह, चिनी, केरा आदि राखेर गोलो पिण्ड तयार गर्ने र पिण्डमा बाहिरबाट तिल छर्कने । दायाँ हातमा मोटक र पिण्ड बायाँ हातमा दुनामा जल लिने ब्राम्हणले तलको पिण्डदान संकल्प पढ्ने । सङ्कल्प पढिसकेपछि  पिण्ड बेदीमा अघि राखिएको  पिताको मोटक माथि पहिलो पिण्ड राखिदिने र दुनाको अवनेजन जल पिण्डमाथि खसालि दिने :-                                                                                     
ॐ अद्येह अमुक सगोत्रं अस्मत्पितः अमुक शर्मन् सपत्नीक वसुस्वरूप अद्यकर्तव्य महालयपरपक्षान्तर्गत पार्वणश्राद्धे एषपिण्डोेऽअमृतस्वरूपोऽअक्षेयतृप्तिहेतोस्ते स्वधा ।
 १०७. सोही तरिकाले तलको सङकल्प पढेर पितामहको मोटक माथि दोस्रो पिण्ड राखिदिने र दुनाको अवनेजन जल पिण्डमाथि खसालि दिने :-             
ॐ अद्येह अमुक सगोत्रं अस्मत्पितामह अमुक शर्मन् सपत्नीक रूद्रस्वरूप अद्यकर्तव्य महालयपरपक्षान्तर्गत पार्वणश्राद्धे एषपिण्डोेऽअमृतस्वरूपोऽअक्षेयतृप्तिहेतोस्ते स्वधा ।
१०८.सोही तरिकाले तलको सङकल्प पढेर प्रपितामहको मोटक माथि तेस्रो पिण्ड राखिदिने र दुनाको अवनेजन जल पिण्डमाथि खसालि दिने :-               
ॐ अद्येह अमुक सगोत्रं अस्मत्प्रपितामह अमुक शर्मन् सपत्नीक आदित्यस्वरूप अद्यकर्तव्य महालयपरपक्षान्तर्गत पार्वणश्राद्धे एषपिण्डोेऽअमृतस्वरूपोऽअक्षेयतृप्तिहेतोस्ते स्वधा ।
१०९.सोही तरिकाले तलको सङकल्प पढेर मातामहको मोटक माथि चौथो पिण्ड राखिदिने र दुनाको अवनेजन जल पिण्डमाथि खसालि दिने :-
ॐ अद्येह अमुक सगोत्रं अस्मन्मातामह अमुक शर्मन् सपत्नीक वसुस्वरूप अद्यकर्तव्य महालयपरपक्षान्तर्गत पार्वणश्राद्धे एषपिण्डोेऽअमृतस्वरूपोऽअक्षेयतृप्तिहेतोस्ते स्वधा ।
११०.सोही तरिकाले तलको सङकल्प पढेर प्रमातामहको मोटक माथि पाँचौं पिण्ड राखिदिने र दुनाको अवनेजन जल पिण्डमाथि खसालि दिने :-
ॐ अद्येह अमुक सगोत्रं अस्मत्प्रमातामह अमुक शर्मन् सपत्नीक रूद्रस्वरूप अद्यकर्तव्य महालयपरपक्षान्तर्गत पार्वणश्राद्धे एषपिण्डोेऽअमृतस्वरूपोऽअक्षेयतृप्तिहेतोस्ते स्वधा ।
१११.सोही तरिकाले तलको सङकल्प पढेर बृद्धमातामहको मोटक माथि छैटौं पिण्ड राखिदिने र दुनाको अवनेजन जल पिण्डमाथि खसालि दिने :-
ॐ अद्येह अमुक सगोत्र अस्मद्बृद्धप्रमातामह अमुक शर्मन् सपत्नीक आदित्यस्वरूप अद्यकर्तव्य महालयपरपक्षान्तर्गत पार्वणश्राद्धे एषपिण्डोेऽअमृतस्वरूपोऽअक्षेयतृप्तिहेतोस्ते स्वधा ।
११२. अब वेदीमाथि ओछ्याएको लामो कुशमा हातमा टाँसिएको पिण्डको बाकी अन्न (लेपभाग) खानेहरूका लागि हात पुछ्ने, औठि फाल्ने र हात धोएर सव्य भएर ६ पटक आचमन गर्ने र हरि हरि सम्झने :- “लेपभागभुजस्तृप्यन्तु”
११३. सव्यबाटै एउटा दुनामा चन्दन अक्षता, पूmल, तिल लिने र उठेर बायाँतिरबाट घुम्दै उत्तरतर्फ फर्किने, पितृको भास्कर मूर्ति लाई स्मरण, ध्यान गर्ने, अपसव्य हुने र तलको मन्त्र पढ्दै दक्षिणतर्फ फर्केर हातमा लिएको फूल अक्षता पिण्डमाथि चढाइदिने :-
ॐ अत्र पितरोे, मादयध्वं यथाभागमा वृषायध्वम् । ॐ अमिदन्त पितरोे यथाभागमा वृषायिषत ।
प्रत्यावनेजन
११४. प्रत्यावनेजनको लागि वायाँ हातमा एउटा दुनामा जल लिने, दायाँ हातमा त्यहि दुनाको पानीमा चोवेर मोटक लिने र तलको सङ्कल्प पढेर मोटक र जल पिण्डमा चढाइदिने ।  (यो क्रम ६ पटक छुट्टाछुट्टै सङ्कल्प पढेर ६ वटा पिण्डलाई प्रत्यावनृेजन दिने )
पितृः-ॐ अद्येह अमुक सगोत्रा अस्मत्पितः अमुक शर्मन् सपत्नीक वसुस्वरुप अद्यकर्तव्य महालयपरपक्षान्तर्गत पार्वणश्राद्धे इदं पिण्डप्रत्यवनेजनं ते स्वधा ।
पितामहः-ॐ अद्येह अमुक सगोत्रा अस्मत्पितामह अमुक शर्मन् सपत्नीक रूद्रस्वरुप अद्यकर्तव्य महालयपरपक्षान्तर्गत पार्वणश्राद्धे इदं पिण्डप्रत्यवनेजनं ते स्वधा ।
प्रपितामहः- ॐ अद्येह अमुक सगोत्रा अस्मत्प्रपितामह अमुक शर्मन् सपत्नीक आदित्यस्वरुप अद्यकर्तव्य महालयपरपक्षान्तर्गत पार्वणश्राद्धे इदं पिण्डप्रत्यवनेजनं ते स्वधा ।
मातामहः-ॐ अद्येह अमुक सगोत्रा अस्मन्मातामह अमुक शर्मन् सपत्नीक वसुस्वरुप अद्यकर्तव्य महालयपरपक्षान्तर्गत पार्वणश्राद्धे इदं पिण्डप्रत्यवनेजनं ते स्वधा ।
प्रमातामहः- ॐ अद्येह अमुक सगोत्रा अस्मन्प्रमातामह अमुक शर्मन् सपत्नीक रूद्रस्वरुप अद्यकर्तव्य महालयपरपक्षान्तर्गत पार्वणश्राद्धे इदं पिण्डप्रत्यवनेजनं ते स्वधा ।
बृद्धप्रमातामहः- ॐ अद्येह अमुक सगोत्रा अस्मन्बृद्धप्रमातामह अमुक शर्मन् सपत्नीक आदित्यस्वरुप अद्यकर्तव्य महालयपरपक्षान्तर्गत पार्वणश्राद्धे इदं पिण्डप्रत्यवनेजनं ते स्वधा ।
११५. कम्मरमा स्यूरिएको पूmल मोटक विसर्जन गरी (खसालि)दिेने, सव्य भएर आचमन गर्ने र हरि हरि स्मरण गर्ने :-
.११६.  पुन अपसव्य भएर बायाँ हातले लिएकोे धागो सुत्र दायाँ हातले पिण्डमाथि उत्तर दक्षिण पारेर तलका मन्त्रहरू पढ्दै क्रमश सबै पिण्डमा चढाइदिने :-                                                                                 
ॐ नमो वः पितरो रसाय नमोव पितरः शोषाय नवो वः पितरो जीवाय नमो वः पितरः स्वधायै नमो वः पितारो घोराय नमो वः पितरो मन्ववे नमो वः पितरः पितरो नमो वोः गृहान्नः पितरो दत्त सतो वः पितरो देष्मैतद्वः पितरो वासः ।
पिण्डपूजनम्                                                                                                                                       ११७.  चन्दन, अक्षता पूmलले पिण्ड पूजागर्ने र धुप, दीप, नैवेद्य, पान, मसला, सुपारी, भेटी आदि बासनादार द्रव्यहरु पिण्डमा चढाउने र पहिलो (पितृकूलका )पितृ ब्राम्हण तर्फ फर्किएर  ३ वटा मोटक र पानी हातमा लिएर संकल्प पढ्ने :-
ॐ अद्येह अमुक सगोत्राः अस्मत्पितृपितामहप्रपितामहा अमुक अमुक शर्मण सपत्नीकाः वसुरूद्रआदित्यस्वरूपाः अद्यकर्तव्य महालयपरपक्षान्तर्गत पार्वणश्राद्धे एतानि पिण्डार्चनानि अत्र सुत्रगन्धपुष्पाक्षता धूपदीपैक्षवादि, नैवेद्यानि त्रेधाविभज्य युष्मभ्यं स्वधा ।
११८. दोस्रोे (मातृृकूलका )पितृ ब्राम्हण तर्फ फर्किएर  ३ वटा मोटक र पानी हातमा लिएर संकल्प पढ्नेः-
ॐ अद्येह अमुक सगोत्राः अस्मन्मातामहप्रमातामहबृद्धप्रमातामहा अमुक अमुक शर्मण सपत्नीकाः वसुरूद्रआदित्यस्वरूपाः अद्यकर्तव्य महालयपरपक्षान्तर्गत पार्वणश्राद्धे एतानि पिण्डार्चनानि अत्र सुत्रगन्धपुष्पाक्षता धूपदीपैक्षवादि, नैवेद्यानि त्रेधाविभज्य युष्मभ्यं स्वधा ।
११९. सव्य हुने र तलको मन्त्र पढ्दै विश्वेदेव ब्राम्हणहरूलाई पालैपालो पूजा गर्दै जाने :-
ॐ शिवा आपः सन्तु:- जल कल्याणकारी होस् भनि जल चढाउने ।                                                            ॐ सौमनस्यमस्तु:-पूmल सुवास दिने होस् भनि पूmल चढाउने ।                                                              ॐ अक्षतं चारिष्टमस्तु इति तण्डुलान् दद्यात् :- अक्षता अरिष्टनाशक होस् भनि अक्षता चढाउने ।
१२०. अपसव्य हुने र तलको मन्त्र पढ्दै पितृब्राम्हण तर्फ ब्राम्हणहरूलाई पालैपालो पूजा गर्दै जाने:-
ॐ शिवा आपः सन्तु:- जल कल्याणकारी होस् भनि जल चढाउने ।                                                            ॐ सौमनस्यमस्तु:-पूmल सुवास दिने होस् भनि पूmल चढाउने ।                                                              ॐ अक्षतं चारिष्टमस्तु इति तण्डुलान् दद्यात् :- अक्षता अरिष्टनाशक होस् भनि अक्षता चढाउने ।
१२१. सव्य भएर पूर्व विश्वेदेव ब्राम्हणतर्फ फर्केर हात जोड्ने, ब्राम्हणले वक्षमाण मन्त्र पढ्ने :-
ॐ अपां मध्ये स्थिता देवाः सर्वमप्सु प्रतिष्ठितम् । ब्राम्हणस्य करे न्यस्ताः शिवा आपो भवन्तु मे ।। लक्ष्मीर्वसति पुष्पेषु लक्ष्मीर्वसति पुष्करे । लक्ष्मीर्वसति गोष्ठेषु सौमनस्यमं ददातु मे ।। अक्षयं चास्तुमे पुण्यं शान्तिः पुष्टिर्धृतिस्तथा । यद्यच्छे«यस्करं लोके तत्तदस्तु सदा मम ।।
अभिषेचनम्                                                                                                                                          १२२. कर्ताले कर्मपात्रको जल मन्त्रैपिच्छे आफ्नो सिरमा छर्कदै जाने, ब्राम्हणले मन्त्र  पढ्ने :-             ॐ अस्मत्कुले दीर्घमायुरस्तु, ॐ शान्तिरस्तु, ॐ पुष्टिरस्तु, ॐ बृद्धिरस्तु, ॐ यच्छे«यस्तदस्तु, ॐ यत्पापं तत्प्रतिहतमस्तु, भूमौ ॐ द्विपदे चतुष्पदेभ्यः शान्तिर्भवतु । इति
अक्षयोदकदानम्                                                                                                                                    १२३.अपसव्य हुने र पिण्ड बटारेर बाँकी रहेको अन्न पिण्डको नजिक लगेर खसालिदिने र बायाँ हातमा दुनामा पानि र दायाँ हातमा मोटक पानि लिने, ब्राम्हणले सङ्कल्प पढ्ने र सबै पिण्डमाथि पालैपालो गरि अक्षेदक जल दिने :-
ॐ अद्येह अमुक सगोत्रस्य अस्मत्पितु अमुक शर्मणः समत्नीकस्य वसुस्वरुपस्य अद्यअद्यकर्तव्य महालयपरपक्षान्तर्गत पार्वणश्राद्धे एत्तैत् अन्नपानादिकम् अक्षयमस्तु ।
१२४. सव्य भएर तलको मन्त्र पढ्दै दक्षिणतर्फ हेर्दै सबै पिण्डमा जलधारा लगाउने                                ॐ अघोराः पितरः सन्तु ।                                                                                                                            १२५. पूर्वतफ फर्किएर हात जोडेर तलको मन्त्रबाट आशिष माग्दै जाने :-
कर्ताले प्रश्न गर्ने,  ब्राम्हणले भन्ने
ॐ गोत्रन्नो वर्धताम् -ॐ वर्धताम्
ॐ दातारो नोऽभिवर्धन्ताम् -ॐ वर्धन्ताम्
ॐ वेदाः वर्धन्ताम् -ॐ वर्धन्ताम्
ॐ सन्ततिवर्धताम् -ॐ वर्धताम्
ॐ श्रद्धा च नो माव्यगमत्-  ॐ मागात्
ॐ बहुदेयं चनोऽस्तु -ॐ अस्तु
ॐ अन्नं च नो बहु भवेत् -ॐ भवतु
ॐ अतिथीश्च लभेमह -ॐ लभध्वम्
ॐ याचिताश्च नः सन्तु -ॐ सन्तु
ॐ मा याचिष्म कञ्चन -ॐ माँ याचेथा
ॐ एताः सत्या आशिषः सन्तु -ॐ सन्तु
१२५. सव्यमा नै ब्राम्हणले मन्त्र पढेर कर्तालाई टिका लगाइदिने . -                                                        ॐ यमं कामं कामयते सोस्मै कामः समृध्यताम् ।
१२६. अपसव्यभई पितृ ब्राम्हणको बायाँतर्फ घोप्ट्याएको दुनोहरूको पूmल पवित्र झिकी पिण्डमाथि राखिदिने र ब्राम्हणलाई स्वधा वाचन गर्न आग्रह गर्ने :-                                                                           कर्ताः ॐ स्वधा वाचयिष्ये   ।   ब्रम्हणँ - ॐ वाच्यताम् ।
१२७. कर्ताले हात जोडेर बस्ने ब्रम्हणले तलको सङ्कल्प पाठगर्ने :-
ॐ अद्येह अमुक सगोत्रेभ्यो अस्मत् पितृपितामहप्रपितामहेभ्योऽ अमुकअमुक शर्मभ्यः सपत्नीकेभ्यो वसुरूद्रआदित्यस्वरूपेभ्य तथा अमुक सगोत्रेभ्या अस्मन्मातामहप्रमातामहबृद्धप्रमातामहेभ्यो अमुकअमुक शर्मभ्यः सपत्नीकेभ्यो वसुरूद्रआदित्यस्वरूपेभ्य अद्यकर्तव्य महालयपरपक्षान्तर्गत पार्वणश्राद्धे स्वधोच्यताम् । ॐ अस्तु स्वधा ।
१२८. कर्ताले एउटा भाँडोमा गाइको दुध लिने र दक्षिण फर्काएर तलको मन्त्र पढेर पिण्डमा दूधको धारा लगाइदिने :-
ॐ उर्जंवहन्तिरमृतं घृतं पयः कीलालं परिश्रुतम् । स्वधास्य तर्पयत् मे पितृन् ।।
१२९. अपसव्यमा नै हात जोडेर तलको मन्त्रहरू पढेर पिण्डदान क्रिया सम्पन्न भएको ब्राम्हणलाई जानकारी गराउने :-                                                                   
ॐ पिण्डाः सम्पन्नाः । ॐ सुसम्पन्नाः । ॐ पिण्डानुत्थापयामि ? ॐ उत्थापयस्व                                           १२९ क. सव्य भई निहुरिएर पिण्डको वासना लिने ।  अपसव्य भएर पिण्डलाई एउटा टपरीमा उठाउने र त्यहाँ राखिएका कुशलाई आगोमा हालिदिने । सव्य भई पिण्ड उठाएको स्थानमा मन्त्रले शंख, चक्र लेखेर पूmल, चन्दन र जौ चढाएर पूजागर्नेः -                                                                             ॐ शंखाय नामः चक्राय नमः ।
१३०.अपसव्य भई पिण्ड लिएर उठ्ने र पिण्डको टपरी काधमा राखेर गया जान एकफन्को घुम्ने र पिण्डको टपरी र्भूमा राखि मन्त्र पढ्नेः -                                                                                                    ॐ गयायां पितृरुपेण स्वयमेव जनार्दनः । तं दृष्ट्वा पुण्डरीकाक्षं मुच्यते च ऋणत्रयात् ।।
बसन्तपूजा
१३१. सव्य भएर आचमन गर्ने र पिण्डको टपरी पिण्डवेदी माथि राख्ने र मन्त्र पढ्दै  घरका परिवार सहित भएर वसन्तको पूजागर्ने । कपूर धूपबत्ती नैवेद्य गर्ने बाँकी बत्तिहरु भए निराजन वालिदिनेः-      ॐ वसन्ताय नमस्तुभ्यं ग्रीष्माय च नमो नमः । वर्षाभ्यश्च शरत्संज्ञ ऋतवे च नमो नमः ।। हेमन्ताय नमस्तुभ्यं नमस्ते शिशिराय च । माससंवत्सरेभ्यश्च दिवसेभ्यो नमो नमः ।।                                                  १३२. विश्वेदेव ब्राम्हणहरूको बायाँतर्फ पूmल पवित्र सहित राखिएका दुनाहरुलाई चलाउने :-
१३३. अपसव्य भएर पितृब्राम्हणतर्फ का पूmल पवित्र सहित घोप्ट्याइएका दुनाहरुलाई उत्तानो पारिदिने :-
दक्षिणा दानम्
दक्षिण संकल्प
१३४ सव्य भएर पितृकूलका विश्वेदेव ब्रम्हणलाई दिने दक्षिणाको लागि एउटा दुनामा कुश, जौ जल, पूmल दक्षिणा द्रव्य हातमा लिने ब्राम्हणले सङकल्प पढ्नेः -                                                               ॐ अद्यः अमुक सगोत्राणां अस्मत्पितृपितामहप्रपितामहानां अमुकामुक शर्मणां  सपत्निकानां वसुरूद्रआदित्य स्वरूपाणां पुरूरवा माद्र्रवानां विश्वेदेवपूर्वकाणां अद्यकृतैतन्महालयपरपक्षान्तर्गत पार्वण श्राद्धे श्राद्धसम्बन्धिवैश्वदेविक श्राद्धप्रतिष्ठासिद्ध्यार्थं इमां दक्षिणां हिरण्यम् अग्निदैवतं तन्मूल्योकल्पितंद्रव्यं यथा दैवतं अमुक गोत्राय अमुक शर्मणे ब्राम्हणाय दक्षिणा तुभ्यमहं संप्रददे । पितृकुलका विश्वेदेव ब्राम्हणमा राखिदिने ।
१३५. मातृकूलका विश्वेदेव ब्रम्हणलाई दिने दक्षिणाको लागि एउटा दुनामा कुश, जौ जल, पूmल दक्षिणा द्रव्य हातमा लिने ब्राम्हणले सङकल्प पढ्नेः -                                                            
ॐ अद्यः अमुक सगोत्राणां अस्मन्मातामहप्रमातामहबृद्धप्रमातामहानां अमुकामुक शर्मणां  सपत्निकानां वसुरूद्रआदित्य स्वरूपाणां पुरूरवा माद्र्रवानां विश्वेदेवपूर्वकाणां अद्यकृतैतन्महालयपरपक्षान्तर्गत पार्वण श्राद्धे श्राद्धसम्बन्धिवैश्वदेविक श्राद्धप्रतिष्ठासिद्ध्यार्थं इमां दक्षिणां हिरण्यम् अग्निदैवतं तन्मूल्योकल्पितं द्रव्यं यथा नाम दैवतं अमुक गोत्राय अमुक शर्मणे ब्राम्हणाय दक्षिणा तुभ्यमहं संप्रददे । मातृकुलका विश्वेदेव ब्राम्हणमा राखिदिने ।
१३६. सव्यमा नै पितृकूलका पितृब्रम्हणलाई दिने दक्षिणाको लागि एउटा दुनामा कुश, तिल जल, पूmल दक्षिणा द्रव्य हातमा लिने ब्राम्हणले सङकल्प पढ्नेः-
  ॐ अद्यः अमुक सगोत्राणां अस्मत्पितृपितामहप्रपितामहानां अमुकामुक शर्मणां  सपत्निकानां वसुरूद्रआदित्य स्वरूपाणाम् अद्यकृतैतन्महालयपरपक्षान्तर्गत पार्वणश्राद्धप्रतिष्ठासिद्ध्यार्थं दक्षिणां रजतं चन्द्रदैवतं तन्मूल्योकल्पितं द्रव्यं यथानाम दैवतं अमुक गोत्राय अमुक शर्मणे ब्राम्हणाय तुभ्यमहं संप्रददे ।                  पितृकुलका पितृ ब्राम्हणमा राखिदिने ।
 १३७. मातृकूलका पितृब्रम्हणलाई दिने दक्षिणाको लागि एउटा दुनामा कुश, तिल जल, पूmल दक्षिणा द्रव्य हातमा लिने ब्राम्हणले सङकल्प पढ्नेः-  
 ॐ अद्यः अमुक सगोत्राणां अस्मन्मातामहप्रमातामहबृद्धप्रमातामहानां अमुकामुक शर्मणां  सपत्निकानां वसुरूद्रआदित्य स्वरूपाणाम् अद्यकृतैतन्महालयपरपक्षान्तर्गत पार्वणश्राद्धप्रतिष्ठासिद्ध्यार्थं दक्षिणां रजतं चन्द्रदैवतं तन्मूल्योकल्पितं द्रव्यं यथानाम दैवतं अमुक गोत्राय अमुक शर्मणे ब्राम्हणाय तुभ्यमहं संप्रददे । मातृकुलका पितृ ब्राम्हणमा राखिदिने
भूयसी दक्षिणा                                                    
१३८.  पुन भूयसि दक्षिणाको लागि एउटा दुनामा दक्षिणा द्रव्य, जल, कुश, तिल, पूmल सहित भूईमा राखेर भूयसि सङ्कल्प पढनेः -                                                                                                               ॐ अद्येह अमुक सगोत्राणाम् अस्मत् पितृपितामहप्रपितामहानांं अमुकअमुक शर्मणानां सपत्नीकोना. वसुरूद्रआदित्यस्वरूपाणां तथा अमुक सगोत्राणां अस्मन्मातामहप्रमातामहबृद्धप्रमातामहानां अमुकअमुक शर्मणानां सपत्नीकानां वसुरूद्रआदित्यस्वरूपाणां विश्वेदेवपूर्व कारणाम् अद्यकृतैतन्महालयपरपक्षान्तर्गत पार्वणश्राद्धे न्यूनानतिरिक्तपरिपूर्णार्थं यद्देयम् अन्नादिकं दक्षिणाद्रव्यं यथानाम ्रदैवतं नानानामगोत्रेभ्यो नानानाम शर्मेभ्या ब्राम्हणेभ्यः कन्याकुमारेभ्यश्च यथाभागं विभज्य यथाकाले दातुमहमुत्सृजे ।  जलमा छुवाएर राख्ने ।
ब्राम्हण विसर्जन                                                                                                                                     १३९. अपसव्य भएर मन्त्र पढ्दै पितृब्राम्हणहरूलाई तिन पटक पानी सेचन गरी  शिखामा घिउ दलेर शिखा फुकाएर विदा गरी दिनेः-
 ॐ व्वाजेवाजेऽवत व्वाजिनोन नो धनेषु व्वप्राऽअमृताःऽऋतज्ञाः ।                                                                   अस्य मध्वः पिवत मादयध्वं तृप्तायात पथिभिद्र्देवयानैः ।।
१४०.  सव्य भएर मन्त्र पढ्दै विश्वेदेव ब्राम्हणहरूलाई तिन पटक पानी सेचन गरी  शिखामा घिउ दलेर शिखा फुकाएर विदा गरी दिनेः-
ॐ पुरूरवोमाद्र्रवो नामानो विश्वेदेवाः प्रीयन्ताम् ।
 १४१. सव्यमा नै हात जोडेर तलको मन्त्र तीन पटक पढ्ने  
ॐ देवताभ्यः पितृभ्यश्च महायोगिभ्य एव च । नमः स्वाहायै स्वधायै नित्यमेव नमोनमः ।।३ पटक                                                                                                              
१४२. अपसव्य भएर दीयो ढकाकिदिने, सव्य भएर आचमन गर्ने, हातगोडा धोएर अञ्जलि बाँधेर प्रार्थाना गर्नेःँ-
ॐ यत्कृतं तत्सुकृतमस्तु, यन्न कृतं तद्विष्णोः प्रसादात् ब्राम्हणवचनात् सर्व परिपूर्णमस्तु ।                          ॐ अस्तु परिपूर्णम् ॐ प्रमादात्कुर्वतां कर्म प्रच्यवेताध्वरेषु च । स्मरणादेव तद्विष्णो: सम्पूर्णः स्यादिति श्रुतिः ।। आयु प्रजांं धनं विद्यां स्वर्ग मोक्षसुखानि च । प्रयच्छन्तु तथा राज्यं पितरः श्राद्धतर्पिताः ।।
कर्मसमर्पणः
१४३.कर्मपात्रमा भएका कुशहरु हातमा लिने र मन्त्र पढ्ने कुशलाई भूईमा छाडि दिनेः-                          ॐ कायेन वाचा मनसेन्द्रियैर्वा  बुद्धत्मना वाऽनुसृतः स्वभावात् ।                                                                         करोमि यद्यत् सकलं परस्मै नारायणायेति समर्पयेतत् ।।
१४४. कर्ताले हात जोडेर बस्ने ब्राम्हणले मन्त्र पढ्दै जाने  । विष्णुलाई स्मरण गर्ने :-                               ॐ यस्य स्मृत्या च नामोक्त्या तपोश्राद्धक्रियादिषु । न्यूनं सम्पूर्णतां याति सद्यो वन्दे तमच्युतम् ।               ॐ चतुर्भिश्च चतुर्भिश्च द्वाभ्यां पञ्चभिरेव च  । हूयते च पुनद्र्वाभ्यामं स मे विष्णुः प्रसीदतु ।।                       ॐ अच्युचाय नमः । ॐ अच्युचाय नमः । ॐ अच्युचाय नमः ।                                                        
१४५.ॐ आयुः प्रजां धनं विद्यां स्वर्गं मोक्षसुखानि च । प्रयच्छन्तु तथा राज्यं पितरः श्राद्धतर्पिताः ।।
प्रसाद ग्रहण
।।अस्तु ।।

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